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हमारी विरासत: एक बेहतर कल

Posted On: 26 Nov, 2010 Others में

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भारत एक प्राचीन भूमि है, इतनी प्राचीन जितना इतिहास स्वयं| इसकी एक विशिष्टता है जो इसे शेष विश्व से एक पृथक पहचान प्रदान करती है और दुनिया की सबसे पुरानी जीवित सभ्यता का मुकुट पहनाती है|देश सभ्यताओं से बनता है और सभ्यताएँ लोगों से तथा लोग अपनी शारीरिक विशेषताओं एवं नियमाचरण से| विकास क्रम में हमें प्रकृति से प्राकृतिक संसाधन एवं अपने पूर्वजों से संस्कृति प्राप्त हुई जिसे हम अपनी सुविधानुसार ढालते गए| इस क्रम में हम अपनी मर्यादाओं को जाने-अनजाने लांघते ही रहे परिणामस्वरूप, हम आज की विकट परिस्थिति में हैं| प्रकृति ने मनुष्य को बुद्धि, ज्ञान एवं कौशल से संपन्न कर श्रेष्ठता की उपाधि से विभूषित किया है, इसलिए नहीं कि हम स्वार्थी होकर सभी संसाधनों का दोहन करें बल्कि इसलिए कि प्रकृति-प्रदत्त तथा हमारे पूर्वजों के अथक एवं अद्वितीय प्रयासों से उद्भूत हुई विरासत का संरक्षण एवं विकास कर सकें|
अक्सर विरासत का अभिप्राय सांस्कृतिक गतिविधियों एवं ऐतिहासिक महत्ता की वस्तुओं से लगाया जाता है लेकिन गहनता से अवलोकन करने पर इसके अन्यान्य वृहद आयाम और वैविध्यपूर्ण रूप सामने आते हैं, जितना हम इसे सामान्यतः समझते हैं| हमें जो कुछ भी आज सुलभ है वो सब हमारे लिए विरासत का ही एक अंग है तथा हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए जो कुछ भी छोड़ कर जायेंगे वो हमारी विरासत ही होगा|
अपनी सम्पूर्णता में विरासत संस्कृति (रहन-सहन, धार्मिक मूल्य, नैतिकता, विविध कलाएं आदि), हमारी नृजातीय विशेषता और सामाजिक आचरण, हमारी परम्पराएं, हमारा पर्यवार्कान, प्राकृतिक संसाधन, अन्य प्रजातियां (पशु-पक्षी आदि) तथा और बहुत कुछ समेटती है जिस एजीवित रखने और अगली पीढ़ी तक अग्रसारित करने के लिए इसका संरक्षण एवं प्रसार नितांत आवश्यक है|
मनुष्य के स्वार्थ ने मानवोचित आचरण का पतन कर के उसे एक ऐसे संसार की ओर धकेल दिया है जहाँ मानवोचित आचरण एवं नैतिकतावादी मूल्यों के लिए बहुत कम स्थान शेष रह गया है| इन श्रेष्ठ गुणों के लिए जितना भी स्थान शेष है वह भी जागरूकता के अभाव और भौतिकता की अंधी दौड़ में शनैः-शनैः विलुप्तप्राय हो चूका है| आज हम एक ऐसे मुक़ाम पर पहुँच गए हैं जहाँ हम जीवन के चौराहे पर खड़े हैं और अपने नफ़े-नुकसान का विश्लेषण कर सकते हैं| जहाँ हम आज रह रहे हैं वो एक भ्रष्ट एवं प्रदूषित संसार है| भौतिकतावाद ने हमारी सर्व-कल्याण की सनातन परंपरा को एक विकराल दावानल की भांति जला कर राख ही कर दिया है| स्वयं तथा अपने परिवार के अलावा किसी और वस्तु या व्यक्ति के बारे में सोचने का समय अब किसी के पास भी नहीं है| मज़बूत जड़ें ही किसी वृक्ष की वृद्धि और उसके अस्तित्व को सुनिश्चित करती हैं| जल एवं उर्वरक से पत्तियों, फूलों, फलों अथवा तनों को नहीं अपितु जड़ों को सींचा जाता है ताके विपरीत एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वृक्ष पर कोई आंच न आने पाए| हमारे जीवन वृक्ष में हम सब ताने, पत्तियों, फल-फूल के रूप में उसके अनिवार्य अंग हैं वहीं हमारी विरासत उसकी जड़ों के रूप में विद्यमान है| अपनी विरासत के प्रति अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्व से मुंह मोड़ना अपने जीवन-वृक्ष की जड़ों को स्वार्थ के दीमक द्वारा खोखला करने के लिए छोड़ने के समान है| इस हरे-भरे फल-पुष्पयुक्त वृक्ष को ठूंठ कर के हम अपने ही भविष्य एवं भावी आगंतुकों के साथ खिलवाड़ करेंगे| एक ऐसा खिलवाड़ जिसकी परिणिति एक अपूरणीय क्षति के रूप में होगी| यदि हम अपनी इस विरासत को अपनी भावी पीढ़ी के हाथों में सौंपते हैं, जिसके लिए उसका संरक्षण अत्यावश्यक है, तो हमारी संतति न सिर्फ अच्छा जीवन जियेगी अपितु एक सुसभ्य एवं सुसंस्कृत समाज का निर्माण करेगी जहाँ हर जगह ‘वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना व्याप्त होगी|
हमारे लिए ये याद रखना ज़रूरी है कि, “ज़रूरी नहीं के हमें विरासत में क्या मिला, ज़रूरी ये है के हम विरासत में क्या छोड़ेंगे|” हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए एक बेहतर कल बनाना तो चाहते हैं पर हमारी सोच और पहुँच वित्तीय प्रतिभूतियों और जीवन के भौतिकतावादी पक्षों तक ही सीमित रह जाती है| हम कभी एक बेहतर स्थान, पर्यावरण और समाज के निर्माण पर विचार नहीं करते| ऐसी संकीर्ण सोच हमारी उन्नति के पथ के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होगी|
कल्पना कीजिये एक ऐसे संसार के बारे में जहाँ हमारी भावी पीढ़ी स्वच्छ एवं शुद्ध वातावरण में साँस ले सकेगी, अधिक स्वास्थ्यप्रद भोजन कर सकेगी, वैविध्यपूर्ण मनोरंजन कर सकेगी, बेहतर माध्यमों से सीखे और पढ़ेगी, जीवन में अधिकाधिक अवसर पायेगी, आपस में मैत्री, सौहार्द एवं सद्भावना होगी, एक समतामूलक एवं सहिष्णु समाज का गठन होगा, नृजातीय एवं नैतिक मूल्यों का संरक्षण होगा तथा वो एक अधिक उत्कृष्ट जीवन जियेगी बनिस्बत उसके, जैसा कि हम जीते हैं| हमारी विरासत सब संभव बनाती है तथा उसे संरक्षित और अग्रसारित कर के उपरोक्त लक्ष्यों की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है| इसलिए, आज के इस युग में जहाँ हम कगार पर रह रहे हैं, हमें कुछ ऐसी युक्तियाँ और उपाय करने की आवश्यकता है जिससे जीवन जीने की एक संपूर्ण तथा त्रुटिहीन पद्धति को आसन्न पूर्ण हानि के खतरों को कम एवं सीमित किया जा सके| ऐसा इसलिए कि न केवल शेष विश्व वरन मानवता भी हमारी ओर आशावादी दृष्टि से देख रही है| इससे पहले कि अपूरणीय विलम्ब हो जाए, हमें एकमात्र उपलब्ध अवसर का सदुपयोग करना होगा, क्रियाशील होना होगा| हमें यह भी याद रखना होगा कि यह एक अनवरत प्रक्रिया है जो कभी समाप्त नहीं होगी| आवश्यकता है केवल इसे पूरी दृढ़ता के साथ आत्मसात करने की ताके यह युगों-युगों तक चलने वाले संकर-संस्कृतिकरण एवं अन्य बाह्य बाधाओं से भी जीर्ण या धूमिल न होने पे| जो नया है, अच्छा है उसे अवश्य अपनाना चाहिए पर जो पुराना और बेहतर है उसे भूलना भी नहीं चाहिए| एक जागृत आज कल की थाती होगा|
आईये! अपनी प्राचीन और महान विरासत को संरक्षित और प्रसारित करने के लिए हाथ से हाथ मिलाएं और बूँद-बूँद से सागर भर दें तथा इसे अविभाज्य और अक्षुण्ण-अजस्र बनाये रखें जैसी ये सदैव से थी| इसी में हमारी जीत निहित है और हमारा उत्थान भी|

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rashid के द्वारा
November 27, 2010

वाहिद भाई आज पहली बार आप का लेख पढ़ रहा हूँ !! देरी से आने के लिए माफ़ी चाहता हूँ !! अच्छा लेख !! उम्मीद है की आपने मेरे लेख भी पढ़े होंगे !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    Wahid के द्वारा
    November 27, 2010

    राशिद भाई, आपके एक-दो लेख मैंने भी पढ़े हैं पर टिप्पणी नहीं कर सका| भूलिएगा नहीं के देर आयद दुरुस्त आयद| :-) शुक्रिया|

    Kert के द्वारा
    July 12, 2016

    This is what we need – an insight to make evrnyoee think

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
November 27, 2010

प्रिय श्री वाहिद जी, निस्‍संदेह हमारा स्‍वार्थ ही हमारी विरासत हमारी संस्‍कृति को नष्‍ट कर रहा है । बूंद बूंद से सागर भरकर ही इसे अविभाज्य और अक्षुण्ण-अजस्र बनाए रखा जा सकता है । सुंदर आलेख बधाई । अरविन्‍द पारीक

    Wahid के द्वारा
    November 27, 2010

    अरविन्द जी, आपकी पारखी समालोचना के लिए धन्यवाद|

abodhbaalak के द्वारा
November 27, 2010

वाहिद जी, मै तो समझ रहा था की आप केवल ग़ज़ल में ही महारत लगते हैं पर आप तो ……. प्रासंगिक विषय पर लिखी आपकी एक अति सुन्दर रचना, बंधाई हो http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    Wahid के द्वारा
    November 27, 2010

    अबोध जी| छुपे रुस्तम तो आप हैं जो अपनी अबोधता में ही ज्वलंत बोध करा जाते हैं| खैर हमारा बहुत गहन सम्बन्ध है संस्कृति के साथ जिसे विस्मृत नहीं कर सकते| आपका शुक्रिया|

nishamittal के द्वारा
November 27, 2010

पर्यावरण के साथ सभी विचारणीय विषयों पर मंथन कराता अच्छा लेख है आपका.

    Wahid के द्वारा
    November 27, 2010

    आपके प्रोत्साहन और उत्साहवर्धन के लिए अनेकों धन्यवाद निशा जी|

    Barbie के द्वारा
    July 12, 2016

    Suilrrsingpy well-written and informative for a free online article.

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 26, 2010

वहीद जी…….. बहुत सही कहा है आपने………….. “ज़रूरी नहीं के हमें विरासत में क्या मिला, ज़रूरी ये है के हम विरासत में क्या छोड़ेंगे|” इस बढ़िया लेख के लिए हार्दिक बधाई……….

    Wahid के द्वारा
    November 27, 2010

    आपका बहुत-बहुत शुक्रिया पीयूष जी|


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