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गंगा : राष्ट्रीय नदी पर राष्ट्रीय शर्म

Posted On: 1 Dec, 2010 Others में

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हज़ारों वर्षों पूर्व प्रस्फुटित भारतीय संस्कृति ने बदलते समय के साथ अनेक बदलावों को आत्मसात किया है, अनेक बाह्य संस्कृतियों के साथ वक्त-वक्त पर हुई पारस्परिक क्रियाओं के माध्यम से नए संस्कारों को अंगीकार किया है| पर उसके मूल स्वभाव और प्रवृत्ति को रंचमात्र भी क्षति नहीं पहुंची| मूल स्वभाव से तात्पर्य है ‘समस्त विश्व को अपना परिवार-कुटुंब मान कर चलना’, और इसीलिए निःस्वार्थ रूप से सबके कल्याण की कामना करना तथा उसके लिए प्रयास करना| अगर हम संपूर्ण विश्व की बात करें तो उसमें मनुष्य के साथ-साथ समस्त चराचर जगत यथा – मुख़्तलिफ़ तहज़ीबें, प्राणी जगत एवं प्राकृतिक धरोहरें भी शामिल होंगे|
माना के इंसान ने ग़ैरत और खु़द्दारी का चोला उतार फेंका है और खु़दगर्ज़ी का चश्मा आँखों पर चढ़ा लिया है जिसे सच को दिखाने से परहेज़ है और अगर सच दिखा भी तो उसे अनदेखा कर देने की आदत| मगर इसका ये मतलब हरगिज़ नहीं के खु़द के सिवा कुछ नज़र ही न आये| चलो, इंसान खु़दगर्ज़ ही सही पर उनका क्या जो बेगर्ज़ बरसों-बरस से बिना कुछ चाहे-मांगे हमारी ज़रूरतों को पूरा करते आ रहे हैं और जिनके बग़ैर ज़िंदगी की कल्पना करना भी बेमानी है| क्या उनके लिए हमारी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं है, वो भी तब जब वह कोई इंसान नहीं|
यहाँ बात हो रही है हमारी राष्ट्रीय नदी गंगा की| कभी कबीरदास ने कहा था “बृच्छ न कबहूँ फल भखै, नदी न संचै नीर; परमारथ के काज को साधुन धरा सरीर|” गंगा हज़ारों वर्षों से अजस्रा-अविरला का रूप धरे हम तुच्छ मानवों के लिए जीवनदात्री की भूमिका का निःस्वार्थ भाव से निर्वाह किये जा रही हैं| इसके बदले उन्हें हमसे कुछ भी अपेक्षित नहीं था मगर हाय ये इंसानी फ़ितरत, जिसने उन्हें कुछ दिया तो नहीं क्यूंकि उन्हें हमसे कुछ चाहिए ही नहीं था बल्के जो कुछ उनके पास था उसे भी उनसे आहिस्ता-आहिस्ता छीन लिया| बेशर्म हिंदुस्तानियों ने अपनी ही माँ का चीर-हरण कर लिया|
गंगा मात्र एक नदी नहीं अपितु भारतीय जनमानस की आस्था, आध्यात्मिकता की प्रतीक भी हैं| भारतीय संस्कृति के उद्भव की गाथा से लेकर आज तक घटित हुए सभी बदलावों की असंख्य वर्षों से साक्षी रही हैं गंगा| देवीस्वरूपा माँ गंगा के साथ किये गए हम इंसानों के कुत्सित-भत्सर्नीय आचरण ने उन्हें एक ऐसे मुक़ाम पर पहुंचा दिया है जहाँ जीवनदायिनी गंगा स्वयं विलुप्तता के भावी दंश से छटपटा रही हैं, संघर्ष कर रही हैं| समस्त भारत की बहुसंख्य जनता के जीवन के अभिन्न अंग के रूप में गंगा जन्म, विवाहादि से लेकर मृत्युपर्यंत सभी प्रमुख संस्कारों से जुड़ी हुई हैं| यहाँ तक कि देहावसान के पश्चात भी पितरों की अतृप्त आत्माओं को इन्हीं के माध्यम से तर्पण-अर्पण किया जाता है| शिव-विष्णु के बीच की कड़ी हैं गंगा| हमारे खेतों की सिंचाई से लेकर भूमिगत जलस्तर तथा उर्वरता बनाये रखना, हमें दाना-पानी से लेकर यातायात तक मुहैया कराना व हमारे इहलोक से लेकर परलोक तक की सुधि लेकर उसे सुधारने का सारा बोझ अनगिनत बरसों से इन्हीं पुण्यसलिला के पावन कन्धों पर रहा है| भागीरथी, अलकनंदा, मन्दाकिनी, जान्ह्वी आदि अनेक नामों से जानी जाने वाली गंगा आज अपने खु़द के अस्तित्व के लिए संघर्षरत हैं| भगीरथ के पुरखों को तारने से शुरू इनका ये तवील सफ़र आज तक अनवरत जारी है और अगर हम चाहेंगे तो हमेशा जारी रहेगा| आज फिर गंगा को किसी भगीरथ की आवश्यकता है, फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि तब भगीरथ के पुरखों के लिए अवतरित हुईं गंगा आज खु़द को तारे जाने के लिए टकटकी लगाये मरणासन्न सी हमारी तरफ़ देख रही हैं| हम सब को अपने अंदर सोए हुए भगीरथ को जगाना होगा, बाहर लाना होगा अन्यथा विगत सहस्रों वर्षों का इतिहास अपने-आप में समेटे हुए गंगा खु़द तवारीख़ के पन्नों में सिमट कर रह जाएँगी, खु़द इतिहास बन कर रह जाएँगी|
यदि आंकड़ों में बात करें तो गंगा की तुलना में दुनिया की कोई भी नदी नहीं ठहर सकती| ख़ास तौर पर उनके द्वारा पोषित आबादी के मुआमले में| देवी गंगा उत्तराखण्ड राज्य में हिमालय स्थित गंगोत्री-गोमुख ग्लेशियर, जो समुद्र से क़रीब ४,१०० मीटर ऊँचा है, से प्रद्भूत होकर अनेक छोटे-बड़े शहरों से होते हुए तक़रीबन २,५०० कि०मी० की यात्रा करके सुंदरबन डेल्टा बनाते हुए बंगाल की खाड़ी में विलीन हो जाती हैं| अपनी इस महायात्रा में वह ५ राज्यों के ५० से भी ज़्यादा बड़े शहरों और अनेक छोटे कस्बों के लगभग २० करोड़ से भी ज़्यादा लोगो को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पोषित करती हैं| एक अनुमान के अनुसार रोज़ाना लगभग २५ से ३० लाख लोग गंगा में स्नान करते हैं| इनके मार्ग का सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश से होकर गुज़रता है और यहीं पर इनकी स्थिति सबसे दयनीय भी है| रोज़ाना करोड़ों-करोड़ लीटर अवजल-मलजल सैकड़ों छोटे-बड़े नालों द्वारा इनमें आकर मिलता है और इनकी शुद्धिकरण की निःसंदेह क्षमता को कमज़ोर करता जाता है| वेदों में भी कहा गया है कि गंगा के स्मरण और दर्शन मात्र से समस्त पाप धुल जाते हैं फिर उनका आचमन करने और उनमें स्नान करना तो हज़ारों तीर्थ करने के बराबर है| लेकिन आज उनकी ये स्थिति है कि हरिद्वार के बाद से उनकी गुणवत्ता प्रभावित होनी शुरू हो जाती है और उत्तर प्रदेश में प्रवेश करने के बाद तो उनका जल आचमन योग्य भी नहीं रह जाता|
अब बात करें सरकारों, नेताओं और स्वयं जनता की| १९८६ में प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने वाराणसी से गंगा एक्शन प्लान के प्रथम चरण की शुरुआत की| उसके बाद द्वितीय चरण भी प्रारंभ हुआ मगर नतीजा वही ढाक के तीन पात| इसी दरमियान प्लान का बजट कई गुना बढ़ गया, हज़ारों-हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च हो गए बल्कि यूँ कहें कि गंगा में बहा दिए गए| सरकारें सोई रहीं, और गंगा तड़पती-बिलखती रहीं अपने हाल पर| इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की बारम्बार फटकार का भी उनपर कोई असर नहीं हुआ| केवल कुम्भ और माघ मेलों के समय न्यायालयों के निर्देश पर चंद बांधों से कुछेक क्यूसेक पानी छोड़ दिया जाता है जो कि किसी भी दृष्टि से अपर्याप्त है| काग़ज़ो पर काम होता रहा और हम सब भी मूक दर्शक बने सबकुछ देखते रहे| वाराणसी के वर्तमान सांसद के केन्द्रीय मंत्रित्वकाल में टिहरी में विशालकाय बांध तैयार हुआ और अपने उद्भव के बाद से प्रथम बार गंगा का अविरल-अजस्र प्रवाह बाधित किया गया| आज पूछने पर वह कहते हैं कि इस बाँध की परियोजना तो १९७० में ही मूर्त रूप ले चुकी थी सिर्फ़ उसका क्रियान्वन हमारे द्वारा किया गया| क्या वे इसे रोक अथवा इसमें फेरबदल नहीं कर सकते थे? और तो और उनसे पहले २००४ से २००९ तक वाराणसी के सांसद रहे सज्जन अपनी ही पीठ थपथपाते नहीं थकते कि उन्होंने सीधा हस्तक्षेप करके प्रधानमंत्री द्वारा गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करवाया और प्रधानमंत्री के द्वारा एक गंगा बेसिन संरक्षण अधिकरण का भी गठन हुआ| क्या इतने से ही उनके कर्तव्यों की इतिश्री हो गई? क्या राष्ट्रीय नदी घोषित हो जाने मात्र से गंगा का जल फिर से पहले जैसा शुद्ध हो जायेगा और उनका अस्तित्व आने वाले कई वर्षों के लिए सुरक्षित हो जायेगा? कोई सवाल ही नहीं उठता| ये मुमकिन ही नहीं| समय-समय पर संत समाज द्वारा भी अन्य धर्मों के रहनुमाओं के साथ मिलकर कई तरह की घोषणाएँ की गयीं, अभी हाल ही में तथाकथित गंगापुत्रों द्वारा गंगायात्रा आयोजित की गयी जो उन्हीं के द्वारा होते हुए अनेक छोटे बड़े शहरों में गयी, श्रमदान किया और कार्यशालाएं आयोजित कीं| सिर्फ़ इतने से ही काम नहीं होने वाला|आज मुझे हमारी राष्ट्रीय नदी की परिस्थिति पर शर्म आती है जिसे मैं राष्ट्रीय शर्म का नाम दूंगा|
चलिए एक नज़र डालते हैं कुछेक रास्तों पर जो हम जैसे आमलोग अपना सकते हैं और माता गंगा के संरक्षण में अपना भी कुछ योगदान कर सकते हैं| लोग घरों-मंदिरों में चढ़ाये गए फूलमाला इत्यादि बड़ी ही श्रद्धा के साथ और ध्यानपूर्वक पोलीथीन की थैलियों में भर कर गंगा में विसर्जित करके हाथ जोड़ते हैं| वहीं घाट किनारे बैठा मैं उनकी मूढ़मति को कोसता रह जाता हूँ कि वाह रे धर्मपारायण लोग| अपने पाप धोने के लिए गंगा को मैला कर रहे हो| अब तो बख़्श दो उन्हें| पशुपालक अपने मवेशियों को ले आकर गंगा में ही नहलाते हैं| अनेक लोग उन्हीं के किनारों को शौचालय के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं| ज़्यादातर लोग तो स्नान करते हुए साबुन, शैम्पू, डिटर्जेंट जैसे केमिकलयुक्त पदार्थों का उपयोग करते हैं जो की इनके प्रदूषित होने के प्रमुख कारणों में से एक है| इन सब क्रियाकलापों पर रोक लगा कर हम अपने स्तर से तो कुछ तो रोक लगा ही सकते हैं उनके प्रदूषण पर| हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी लिखा हुआ है कि, “स्वतः वाहिनी शुद्धयते,” अर्थात यदि उनके मूल प्रवाह को बने रहने दिया जाये तो अपनी अधिकतर गंदगी को वे स्वयं ही साफ़ कर लेंगी और जो बाक़ी बचेगा वो काम हमारे ज़िम्मे रह जायेगा| आज उनके ऊपर बने अनेकानेक बांधों ने उनके प्रवाह को अवरुद्ध कर दिया है और उनके अंदर जो जल बचा हुआ है वो गंगाजल नहीं अपितु विशुद्ध रूप से नालों का गंदला पानी और फैक्टरियों से निकला हुआ हानिकारक कचरा है| एक रास्ता ये भी हो सकता है कि उनके प्रवाह को सुनिश्चित करने के लिए टिहरी बांध के ठीक पहले से एक वैकल्पिक मार्ग पहाड़ों को खोद कर उनकी निकासी के लिए बनाया जाये| जिससे उनका प्रवाह फिर यथावत हो जाये| जब बाँध के निर्माण पर हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च हो सकते हैं तो उनके मूलस्वरूप को लौटाने का प्रयास करने में उसका कुछ हिस्सा तो लगाया ही जा सकता है और यक़ीनन ये एक अच्छी शुरुआत होगी| आज हमारे देश में सिर्फ़ गंगा ही नहीं अपितु उनकी सहायक अन्य नदियों यथा – यमुना, गोमती, सरयू आदि का भी कमोबेश यही हाल है| शुभारंभ माँ गंगा से होकर उसका लाभ अन्य सभी तक भी पहुँचाया जाना चाहिए| दृढ़ संकल्प और अदम्य इच्छाशक्ति के बल पर यह अति दुष्कर कार्य भी साध्य है| और हम सब की यही इच्छा और कामना है कि ऐसा ही हो| अतीत के गौरव को वर्तमान में संजोते हुए एक सुनहरे भविष्य की आशा में ….

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Eagequesawsem के द्वारा
October 23, 2011

हाँ, वास्तव में .

    Crissy के द्वारा
    July 12, 2016

    You can always tell an expert! Thanks for coubnitntirg.

SATYA SHEEL AGRAWAL के द्वारा
March 7, 2011

श्री वाहिद जी ,आपकी इच्छा अनुसार आपका लेख पढ़ा तो ज्ञात हुआ अपने काफी शोध किया है पवित्र गंगा की पवित्रता बचने के लिए आप वास्तव साधुवाद के पात्र हैं आपके और मेरे विचार बिलकुल मेल खाते हैं ,

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    March 7, 2011

    आदरणीय अग्रवाल जी, आपने अपने क़ीमती वक़्त में थोड़ा निकाल कर मेरा यह लेख पढ़ा इसके लिए आपका हार्दिक आभारी हूँ|

    Mccayde के द्वारा
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Amit के द्वारा
December 3, 2010

वाहिद भाई इस सुंदर लेख पर लख लख बधाई …पर अपने इस समस्या का कोई समाधान नहीं बताया और वाराणसी के सांसद की तरह आप भी इतिश्री नहीं करेंगे ऐसी आशा है …..कृपया कोई एक्शन प्लान बताये फिर तो कोई बात है….नहीं तो इस लेख का कोई भी फायदा नहीं है सिर्फ कुछ हम जैसे बुध्जीवी इसे पड़कर थोडा सा कोसेंगे और फिर दूसरा ब्लॉग पड़ना शुरू कर देंगे और इस मेहनत को भी गंगा मई बहा देंगे………

    Wahid के द्वारा
    December 3, 2010

    अमित जी! आपका कहना तो बिलकुल सही है| अगर आपने पढ़ा है तो देखा होगा की लेख के अंत में मैंने एक-दो बातें कही हैं| जैसे कि पूर्व की भांति उनके मूल प्रवाह का स्वरुप लौटाना| बुनियादी तौर पर मैं अगर गंगा किनारे मौजूद होता हूँ तो लोगों को गंदगी इत्यादि गंगा में डालने नहीं देता न ही कभी खुद ऐसा करता हूँ| रही बात समस्या के समाधान की तो मैं वैज्ञानिक या नीति नियंता नहीं जो उसे ढूंढ सकूं जितना मुझे समझ में आया वो मैंने कह दिया| व्यक्तिगत तौर पर मैं इस विषय पर जो कुछ भी कर सकता हूँ करता हूँ और मेरे कुछ मित्र भी हैं जो मेरे साथ जुड़े हुए हैं| पर हम अपना काम शांतिपूर्वक करते हैं और उसका प्रसार करने का प्रयास करते हैं, प्रचार करने का नहीं| आपको भी आमंत्रण है हमारे साथ जुड़ने का| आपके सुन्दर विचारों के लिए आपको अनेकों धन्यवाद|

ashutoshda के द्वारा
December 2, 2010

वाहिद जी आप ने बिलकुल सही लिखा है अगर समय रहते हमने कुछ सकारात्मक पहल नहीं की तो स्थति वाकई दुखदायी होगी वैसे प्रकर्ति भी दुखी हो कर यदा कदा इंसानों के थप्पड़ मारती रहती है जब उसे लगता है स्थति बदतर हो चली है भूकंप ,बाढ़ , सुखा इत्यादि प्रकर्ति के इंसानों पर पड़ने वाले थप्पड़ ही तो है आशुतोष दा

    Wahid के द्वारा
    December 2, 2010

    आशुतोष दा! शोत्य कोथोन| हमारे दुष्कृत्यों की सज़ा प्रकृति हमें गाहेबगाहे देती ही रहती है और हम हर बार वैचारिक मंथन कर के चुपचाप बैठ जाते हैं| क्रियान्वन रहित विचार ठीक वैसे ही हैं जैसे कि बिना पहियों की साइकिल| इन थप्पड़ों से हमें सीख लेनी चाहिए, सुधर जाना चाहिए और अपनी अनमोल धरोहरों की सुध लेने के लिए कमर कस लेनी चाहिए| आपकी टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद|

Dharmesh Tiwari के द्वारा
December 2, 2010

वाहिद जी,गंगा वो नदी है जिसको हमारे समाज में माता की संज्ञा दी गयी है और लोग गंगा के साथ माता शब्द को जोड़ते हैं,और फिर इसी माता को सुरछित भी रखने में लापरवाही बरतते है,आदरणीय दीपक जी निचे प्रकाश डाला है की जिस तरह गंगा नदी की हालत आज देखि जा रही है ठीक वैसे ही दिल्ली में जमुना को भी देखा जा सकता है,अब इससे शर्मनाक बात क्या हो सकती है की अपने धरोहरों को बचाने के लिए जागरूकता शिविर चलाने की जरुरत पड़ती है लेकिन अभी और भी जागरूकता शिविरों को चलाने की जरुरत है,बाकि आपने वाराणसी के ऊपर जो जानकारी रखने की बात कही है तो आप स्वागत है और इंतजार रहेगा,धन्यवाद!

    Wahid के द्वारा
    December 2, 2010

    धर्मेश जी! इसमें कोई दो राय नहीं की इससे बड़ी शर्म की बात क्या होगी अपनी धरोहरों को बचने के लिए जागरूकता शिविर चलाने पड़ते हैं| यह तो हमारी सहज वृत्ति होनी चाहिए कि जो हमारा है उसे बचा कर रखें जिस प्रकार अपनी व्यक्तिगत वस्तुओं को रखते हैं| यदि इसी प्रकार आप लोग प्रोत्साहन देते रहे तो अतिशीघ्र वाराणसी पर एक आलेख आप लोगों के बीच होगा| आपके मूल्यवान विचारों के लिए तहेदिल से शुक्रिया|

    Janet के द्वारा
    July 12, 2016

    Arltcies like this make life so much simpler.

nishamittal के द्वारा
December 2, 2010

वाहिद जी,गंगा की पवित्रता की महिमा आपने तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत करने पर बधाई जीवनदात्री,मोक्षदात्री पतितपावनी को इस रूप तक पहुंचाने के लिए हम-आप जैसे भाई बन्धु उत्तरदायी हैं.हमारी स्तिथी ठीक उस मूर्ख के समान है जो जिस दल पर बैठा है उसी को काट रहा है.कितने भी अभियान चलाये जाएँ कितना ही धन बहा दिया जाए दृढ इच्छा शक्ति ,प्रतिबद्धता की कमी तथा जनजागृति के बिना हम गंगा को नहीं बचा सकते.

    Wahid के द्वारा
    December 2, 2010

    आदरणीया निशा जी| आपके कथन से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ कि, “हमारी स्थिति ठीक उसी मूर्ख के समान है जो जिस डाल पर बैठा है उसी को काट रहा है|” आपकी बहुमूल्य टिप्पणी के लिए शुक्रिया|

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
December 2, 2010

वाहिद जी, भई मान गए आप की लेखनी को कितनी शुद्ध हिंदी लिखते है। आज के आधुनिकरण व शहरीकरण के कारण ही आज गंगा में प्रदुषण बढता जा रहा है। पर हम भारतीयों की मानसीकता नहीं बदल सकती वह जानते बुझते हुए भी कचरा कुडा नदी में प्रवाहीत करने से बाज नहीं आती। जो हाल गंगा का आप ने ब्‍यां किया है आज वही हाल दिल्‍ली में बह रही जमुना का भी है यदि बरसात के दिनों को छोड़ कर आप उसे देखें तो कहेंगे के यह एक गंदा नाला है जमुना तो है ही नहीं। बहुत ही अच्‍छी रचना के लिए आप को बधाई। और जैसा की आप ने कहा है कि आप वाराणसी के इतिहास पर लिखना चाहते है बहुत ही अच्‍छा विचार है हमें उस का बेसब्री से इंतजार रहेगा। -दीपकजोशी63

    Wahid के द्वारा
    December 2, 2010

    आदरणीय दीपक जी| हिंदी-भोजपुरी भाषी हूँ तो कुछ तो प्रभाव रहेगा ही| आप का कहना बिलकुल सही है कि गंगा ही नहीं अपितु अन्य अनेक धार्मिक-सांस्कृतिक महत्व वाली नदियाँ आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत हैं और इसका ज़िक्र मैंने अपने लेख के अंत में किया भी है| बधाई के लिए आपको धन्यवाद| यदि आप लोगों का यूँ ही सकारात्मक उत्तर मिलता रहा तो जल्द ही वाराणसी पर पहला आलेख आप लोगों के समक्ष होगा|

Wahid के द्वारा
December 2, 2010

मित्रों, आप सभी लोगों से एक राय लेना चाहता था अगले ब्लॉग के पहले| मैं चूंके वाराणसी का रहने वाला हूँ तो मैं चाहता हूँ के मेरा शहर जो पहले से ही बहुत सी वजहों से मशहूर है उसके बारे में मैंने क्या जाना है और उसकी मेरी नज़र में क्या असलियत और अहमियत है आप सब को भी बताऊँ| एक श्रृंखला शुरू करना चाहता हूँ वाराणसी के ऊपर जिसमें एक-एक करके वाराणसी के भूगोल, इतिहास, मिथक, अर्थशास्त्र और पौराणिकता सभी के बारे में जानकारी देने का प्रयास करूँगा|इस ब्लॉग श्रृंखला को प्रारंभ करने से पहले मैं देखूँगा के आप लोगों के बहुमत को प्राप्त करूं| इस शुक्रवार तक प्राप्त टिप्पणियों में यदि अधिक जवाब हाँ हुए तो ठीक अन्यथा फिर कभी एक सुअवसर की प्रतीक्षा करूँगा| सस्नेह निवेदन और धन्यवाद के साथ,

    Brandie के द्वारा
    July 12, 2016

    That’s a clever answer to a tricky quisteon


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