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"बड़ी तवील सी है ज़िंदगी"

Posted On: 29 Oct, 2011 में

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न हो सका ख़ुशी में शामिल तो मलाल नहीं

शुक्र है ग़म तो किसी का मैं यहाँ बाँट सका;


बड़ी तवील सी है ज़िंदगी जो ख़त्म ना हो

तन्हाईयों का ये वक़्त न मैं काट सका;


सारे दुःख-रंज मुझे छोड़कर चल दिए रस्ते

सारी दुश्वारियों को जी भर के आज डाँट सका;


खड़े ज़िंदगी के चौक पर सोचा तो पाया उम्र  से इस

हूँ ख़ुशनसीब जो कुछ अनमोल लम्हे छांट सका;


वो मेरा दोस्त था क़रीब फिर भी दूर बहुत

जो फ़ासिले थे दरमियाँ न उन्हें पाट सका;


आज हूँ तंगहाल-तंगदस्त क्यूँ,  जानते हो?

मेरा ख़ुद्दार ज़मीर तलवे कभी न चाट सका;

===================================================

तवील=लंबी; तंगदस्त=हाथ तंग होना/रुपये-पैसे न होना;

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76 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
November 12, 2011

खूबसूरत रचना ……

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 13, 2011

    ख़ुशामदीद पीयूष भाई। लंबे समय के बाद आप को यहाँ देख कर बहुत ही अच्छा लगा। :)

Abdul Rashid के द्वारा
November 12, 2011

आज हूँ तंगहाल-तंगदस्त क्यूँ, जानते हो? मेरा ख़ुद्दार ज़मीर तलवे कभी न चाट सका; बहुत उम्दा तहे दिल से मुबारकबाद और बेहतर लिखने की दुआ के साथ सप्रेम अब्दुल रशीद

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 12, 2011

    प्रोत्साहन के लिए आपका हार्दिक आभार राशिद भाई। आपकी दुआ क़ुबूल हो यही मेरी भी दुआ है।

munish के द्वारा
November 11, 2011

वाहिद भाई बहुत खूब, बहुत ही अच्छी रचना…….. मैं तो पता नहीं आज तक आपके ब्लॉग पर क्यों नहीं पहुँच पाया……..बस एक गलत बात है आपके ब्लॉग में और वो हा “© & (P) All Rights Reserved ” :) http://munish.jagranjunction.com/2011/11/05/%e0%a4%ad%e0%a4%97%e0%a4%a4-%e0%a4%b8%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%b9-%e0%a4%95%e0%a5%8b-%e0%a4%ab%e0%a4%bf%e0%a4%b0-%e0%a4%ab%e0%a4%be%e0%a4%81%e0%a4%b8%e0%a5%80/

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 12, 2011

    शुक्रिया मुनीश भाई, आपसे प्रोत्साहन मिलता है तो और अच्छा करने का संबल भी प्राप्त होता है। देर-सबेर ही सही आप की आमद हुई तो सही। ये © & (P) All Rights Reserved अपनी रचनाओं का दुरूपयोग रोकने के लिए है। हालाँकि मंच के साथी ब्लॉगर इसी मंच पर मेरी रचनाओं का उपयोग करने के लिए इस बंधन से मुक्त हैं। प्रतिक्रिया के लिए आपका धन्यवाद, :)

sumandubey के द्वारा
November 11, 2011

वाहिद जी नमस्कार, ये रचना मै नही देख पाई वाहिद भाई आप तो अच्छी गजल लिख लेते है आन्तिम शेर बहुत उम्दा है मै भी इसकी क ख ग सीखना चाह रही हूं जरा समीक्षा के साथ ही ये बताया करे कि कैसे गजल के रूप मे वह उन भाव श्ब्दो के साथ उम्दा बने और कहां कमी है।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 12, 2011

    नमस्कार सुमन जी, मेरी और इस ग़ज़ल को पढ़ने वाले हरेक ब्लॉगर की ही तरह आपने भी उसी शेर को पसंद किया है। आप अच्छा लिखती हैं। अगर मैं आपके इस हुनर को निखारने में किसी भी तरह से काम आ सका तो मुझे बेहद ख़ुशी होगी। आपने तो भाई माना है तो एक तरह से ये मेरा फ़र्ज़ भी है कि आपकी मदद करूँ। आप किसी भी तरह के सवालों के लिए मेरे ई मेल - sdwivedi16@rediffmail.com पर संपर्क कर सकती हैं। प्रतिक्रिया के लिए आपका तहेदिल से शुक्रिया,

Charchit Chittransh के द्वारा
November 10, 2011

दोस्त; दिल में गहरे उतर जख्म कुरेदती / सहलाती खूबसूरत सी गजल …. खासकर हमखयाला से ये तीन सैर …. खड़े ज़िंदगी के चौक पर सोचा तो पाया उम्र से इस हूँ ख़ुशनसीब जो कुछ अनमोल लम्हे छांट सका; – वो मेरा दोस्त था क़रीब फिर भी दूर बहुत जो फ़ासिले थे दरमियाँ न उन्हें पाट सका; – आज हूँ तंगहाल-तंगदस्त क्यूँ, जानते हो? मेरा ख़ुद्दार ज़मीर तलवे कभी न चाट सका;

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 11, 2011

    आपका बहुत शुक्रिया चित्रांश भाई। ये तीन शेर ही मुझे ख़ुद भी सबसे ज़्यादा पसंद हैं। अच्छा लगता है जब अपने विचारों को समान आवृत्ति मिलती है।  साभार,

November 8, 2011

वाहिद भाई ! बहुत बहुत शुक्रिया एक उम्दा रचना प्रस्तुत करने के लिए। बहुत अच्छा लगा आज इस रचना को पढ़कर…ईश्वर आपकी लेखनी को दिनो दिन बरकत दे ! खास कर ये पंक्ति बहुत अच्छी लगी: आज हूँ तंगहाल-तंगदस्त क्यूँ, जानते हो? मेरा ख़ुद्दार ज़मीर तलवे कभी न चाट सका।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 9, 2011

    शुक्रिया सूर्य बाली जी, आप द्वारा चयनित पंक्तियाँ ही इस ब्लॉग के हरेक पाठक और स्वयं मेरी भी पसंदीदा पंक्तियाँ हैं।  साभार,

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
November 4, 2011

बहुत खूब वाहिद भाई जिन्दगी की अजीब सच्चाई को आप ने हू बहू यहाँ उतार दिया ..बहुत सुन्दर …सत्य..सुन्दर काविले तारीफ़ रचना मन को प्रभावित कर गयी…यही होता है ….. आज हूँ तंगहाल-तंगदस्त क्यूँ, जानते हो? मेरा ख़ुद्दार ज़मीर तलवे कभी न चाट सका; भ्रमर ५

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 4, 2011

    भ्रमर भाई, आपका बहुत बहुत शुक्रिया। इसी एक शेर पर तो पूरी रचना ही आधारित है। आभार सहित,

Sushil Kumar Rai के द्वारा
November 4, 2011

good one once again. it is a pleasure to read your poems and gazals always. Coming to Varanasi by the end of this month. We all are fine here.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 4, 2011

    शुक्रिया मित्र। हाँ एक बात बताओ क्या यहाँ हिंदी में लिखने में कोई समस्या है तुम्हें? दुबई में तो नहीं हो न अब.. ये हिंदुस्तान है दोस्त। और हाँ दो साल बाद तुम लौट रहे हो इसकी मुझे ख़ुशी भी है और बेसब्री से इंतज़ार भी है।

Vicky के द्वारा
November 3, 2011

बहुत अच्छी लगी ये गजल भईया। दुकान के काम से छुट्टी नहीं मिल पाती कि आपको पढ़ पायें।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 3, 2011

    अरे बेटे.!!.. तुम यहाँ तक आ पहुंचे ये क्या कम है मेरे लिए| वक़्त आ गया है अब कुछ दिन के लिए छुट्टी ले लो दुकान पर भाईयों को बैठने दो, आओ कहीं से घूम कर आते हैं| :)

roshni के द्वारा
November 3, 2011

वाहिद जी गहरे जज्बातों से भरी ग़ज़ल … ये बयाँ करती की कितने ही मुश्किल दौरों से ये जिन्दगी गुजरी है मगर राही खड़ा है अपने इमान और ख़ुधारी से … बहुत बढ़िया ग़ज़ल

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 3, 2011

    रोशनी जी, हमेशा की तरह आपसे हौसला अफ़ज़ाई पाकर अच्छा लगा| इसकी रचना के पीछे छुपा उद्देश्य सिद्ध हो रहा है ऐसा मुझे प्रतीत हो रहा है| आपका बहुत शुक्रिया वक़्त निकाल कर इसके अवलोकन के लिए> साभार,

ashvinikumar के द्वारा
November 1, 2011

मेरे प्यारे भाई ,,बहुआयामी गजल है इसका हर एक शेर एक नई और अलग कहानी ब्यान कर रहा है ( न हो सका ख़ुशी में शामिल तो मलाल नहीं ,शुक्र है ग़म तो किसी का मैं यहाँ बाँट सका;) काश यह जज्बात हर हिन्दोस्तानी के दिल में हो लेकिन अफ़सोस न जाएं क्यों लोग द्विआयामी जीवन शैली अपनाते हैं —(बड़ी तवील सी है ज़िंदगी जो ख़त्म ना हो तन्हाईयों का ये वक़्त न मैं काट सका;) अनुराधा पौडवाल एक एक गजल गाई थी शायद तुम्हे याद हो (जिन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं ,, मै तो मर कर भी मेरी जान तुम्हे चाहूंगी ) यहाँ जिन्दगी बहुत ही छोटी जान पडती है लेकिन उक्त शब्दों के मायने अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग हो सकते haen – yaar aaj bhut kuchh likhne kaa man thaa but Translator is not working :) so fir kbhee– jay bharat

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 1, 2011

    अश्विनी भाई नमस्कार, ग़ज़ल तो बहुआयामी होती ही है। आपने अपना क़ीमती वक़्त निकाल कर हर एक शेर को तवज्जह देकर पढ़ा और साथ ही अपने ढंग से उसकी व्याख्या भी की उसके लिए आपका आभार व्यक्त करना अति आवश्यक है। किसी भी कविता या ग़ज़ल में यही ख़ासियत होती है कि लोग उसके अर्थ अपने सन्दर्भ विशेष में ग्रहण कर सकें, तभी उसकी सार्थकता भी सिद्ध होती है। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया इस विस्तृत एवं सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए।

rahulpriyadarshi के द्वारा
October 31, 2011

न मुह छुपा के जियो,और न सर झुका के जियो….शान से सर उठा के जियों,टुकड़ों पर कुत्तों की जिंदगी पलती है,इंसान अपने जमीर से जीता है. धाँसू,दमदार कविता.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 31, 2011

    आपने मेरे विचारों को सदैव ही समर्थन का संबल प्रदान किया है। आपके लिए तो शुक्रिया शब्द बहुत छोटा है राहुल फिर भी धन्यवाद तो बनता ही है। :)

anamika के द्वारा
October 31, 2011

सम्मान के साथ साथ जीना है ज़िन्दगी है ….बहुत अच्छी प्रस्तुति

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 31, 2011

    जी बिलकुल मेरा भी यही मानना है अनामिका जी। आप भी काशी में रहती हैं और काशी तो इसीलिए जाना ही गया है। सराहना के लिए आभारी हूँ।

rajeevdubey के द्वारा
October 30, 2011

बहुत खूब… अहसास की ऊंचाइयां ऐसे ही हालातों में उभरती हैं… कहते हैं कि अगर दर्द न होता तो दुनिया सच्चाई से अनजान ही रहती …! लेकिन, यह भी सच है कि इस दर्द के पार एक रौशनी भरी राह है … चले आइये, अहिस्ता अहिस्ता …

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 31, 2011

    आदरणीय राजीव जी, आपकी कविताओं की प्रखरता एवं ओजस्विता से तो मैं हमेशा ही प्रेरित रहा हूँ। उसी प्रकाशित पथ के लिए तो मैं चला हूँ और आपके ही सानिध्य में वह शीघ्र ही मिल भी जाएगा ऐसा मुझे लगता है। मैं चला आ रहा हूँ आहिस्ता-आहिस्ता..  :)

naturecure के द्वारा
October 30, 2011

आदरणीय वाहिद भाई सादर अभिवादन ! बहुत सुन्दर भाव अभिव्यक्ति | आज हूँ तंगहाल-तंगदस्त क्यूँ, जानते हो? मेरा ख़ुद्दार ज़मीर तलवे कभी न चाट सका; उत्कृष्ट रचना के लिए बहुत बहुत – बधाई |

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 31, 2011

    कैलाश जी नमस्कार, ये पूरी रचना मेरे इसी शेर पर आधारित है। धन्यवाद आपका प्रतिक्रिया के लिए।

Rajkamal Sharma के द्वारा
October 30, 2011

प्रिय वाहिद भाई ….आदाब ! ए काश ! उसको खबर होती उसने किसे ठुकराया है ? मंदिर सा इक दिल ढाया है ….. चाहा तो हमने भी कई मर्तबा पत्थर का सनम होना हर बार हमारा अच्छा होना आढ़े आ गया ! आपकी तरफ से इस प्रतीकिर्या के लिए मुझको हार्दिक बधाई ! लीजिए मैंने आपको इस मंच की अपचारिकता निभाने के धर्म संकट से बचा लिया ……हमारे जुबली कुमार से कहिएगा की पिछले कुछेक दिनो से मुझको एक सपना बार -2 परेशान कर रहा है …… सपने मे उनकी दो जुड़वा रचनाए दिखाई देती है और फिर अचानक से गायब भी हो जाती है ……. आपका मुबार्कबाद सहित आभार न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 31, 2011

    प्रिय राजकमल भाई, आपने जो शेर कहा वो तो बहुत ही बेहतरीन है। आपने औपचारिकता से भी स्वयं को बचा लिया ये सचमुच बड़ी बात है (मैंने तो आपके जुबली जी से मज़ाक-२ में ही कहा था)। अब अगर आपको अपने सपनों में पिछले कुछ दिनों से उनकी जुड़वाँ रचनाएँ दिख रही हैं तो इसका कारण शायद आपका उनके प्रति असीम मित्रवत स्नेह ही है। शेष अगर आप वाकई उनसे कुछ कहना चाहते हैं तो आपको कोई रोक नहीं सकता। आप उनसे जब भी चाहें उनसे ९४१२०५९८५९ पर संपर्क कर सकते हैं ( उन्होंने आपको पहले भी यह संपर्क सूत्र दिया है) आपको भी पर्वोत्सव की अनेकानेक हार्दिक शुभकामनाएँ एवं हमारी अभिलाषाएं(आपकी सफलता एवं उन्नति हेतु)। और अंततः आपका हार्दिक आभार ;)   

Vasudev Tripathi के द्वारा
October 30, 2011

सीमित शब्दों के गंभीर प्रयोग की उदाहरण पुनः उत्कृष्ट रचना। एक शिखर कृति के सानिध्य का आनन्द देने के लिए शब्दों की सीमाओं में चन्द प्रशंसा-पुष्प आपके कृतित्व को अर्पण।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 31, 2011

    प्रिय वासुदेव जी, कम शब्दों में ज़्यादा कह देना ही कवि की प्रवृत्ति का परिचायक होता है। आपके शब्दों के आगे मेरे उत्तर के लिए न तो अक्षर ही याद आते हैं न ही उनसे मिल कर बने शब्द। आपकी सदाशयता और निर्भीकता के लिए आपका प्रशंसक बना रहूँगा। आभार समवेत,

neelamsingh के द्वारा
October 30, 2011

वाहिद भाई , कविता भावपूर्ण है अच्छी लगी , बधाई !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 30, 2011

    आपके प्रोत्साहित करते स्नेहाशीष से एक नयी भावना का संचार हुआ। विनयावनत,

Mahendra Kumar Arya के द्वारा
October 30, 2011

प्रिय मित्र, जानता तो था कि तुम साहित्य से जुड़े हुए हो पर तुम्हारे बताये अनुसार आज यहाँ आ कर देखा तो पाया कि यहाँ पर बहुतेरे लोग तुम्हारे प्रशंसक है। देख कर बहुत ही ख़ुशी हो रही है।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 30, 2011

    अरे वाह!! मैं नहीं जानता था कि तुम इतना फ़ास्ट एक्शन लोगे| अभी परसों ही तो तुमसे इस विषय पर चर्चा हुई थी| चलो, जैसे भी हो कम से कम तुम यहाँ पधारे तो| ;)

sadhana thakur के द्वारा
October 30, 2011

वाहिद भाई ,दिल में कुछ दरक सा गया ,किसी बेवफा की याद आ गई .एक बहुत ही सुन्दर रचना .खुदा आपकी लेखनी को और बरकत दे .बस यही दुआ है …..

    Lahar के द्वारा
    October 30, 2011

    साधना जी शुभप्रभात दिल में कुछ दरक सा गया ,किसी बेवफा की याद आ गई वह क्या बात है | बहुत खूब

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 30, 2011

    सुन्दर पंक्तियों से सजी आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद साधना जी। आपकी दुआओं के लिए भी शुक्रगुज़ार हूँ।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 30, 2011

    आपका भी शुक्रिया पंकज जी।

Amita Srivastava के द्वारा
October 29, 2011

वाहिद भाई कभी अच्छी लगी वो इतनी ,कभी बुरी लगी | हर रूप जिसका देखा थी मेरी जिन्दगी || आपके अंतिम शेर ने तो कमाल ही कर दिया मुबारकबाद ……

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 30, 2011

    आपकी गद्यात्मक प्रतिक्रिया तो अत्यंत ही मनभावन रही अमिता जी। आपके इस इकलौते शेर ने तो हर मंज़र ही बयां कर दिया। अंतिम शेर मेरे लिए भी मेरी व्यक्तिगत पसंद का है क्यूंकि वो मेरे हठी स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। और क्या कहूँ बस एक कलाकार की सनक या धुन।  आपका तहे दिल से शुक्रिया इस सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए।

Lahar के द्वारा
October 29, 2011

प्रिय वाहिद भाई नमस्कार | उम्र के इस पड़ाव पर वो मिले भी तो अनजाने बनकर | देखा उन्होंने हमे , यूँ बगाने बनकर | …………………. आपकी ग़ज़ल की आखिरी पंक्ति हमे बहुत पसंद आयी वाहिद भाई | आपकी बहतरीन गज़लों में से ये एक है जो काफी हद तक किसी की हकीकत बयां करता है एक उत्कृष्ट रचना के लिए बहुत बहुत – बधाई |

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 30, 2011

    नमस्कार पंकज जी, मेरी ग़ज़ल का आख़िरी शेर ही है जिसने मुझे ये हौसला दिया कि इसे इस मंच पर प्रस्तुत कर पाऊं। ये जो कुछ भी यहाँ पेश है वो मेरा व्यक्तिगत अनुभव ही है (जो अधिकांश मामलों में होता है सिवा उसके जब वह प्रायोजित हो)। हक़ीक़त तो हमेशा हमारे सामने ही है पर हम ही अपनी आँखों पर क़िस्म-क़िस्म की पट्टियां बाँध कर अबूझ बने रहते हैं। धन्यवाद आपका प्रोत्साहन और प्रतिक्रिया दोनों ही के लिए।

minujha के द्वारा
October 29, 2011

एक बहुत ही खूबसूरत रचना,पर एक बात से सहमत नहीं हुं ख़ुद्दारी सी दौलत हासिल होने के बाद भी तंगहाली का मलाल क्यूँ ?पर फिर कहना चाहुंगी एक बेहतरीन गज़ल

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 30, 2011

    मीनू जी, सर्वप्रथम तो आपका स्वागतम मेरे ब्लॉग और इस मंच पर। दरअसल ये तंगहाली का मलाल नहीं भौतिकतावाद के मुंह पर तमाचा मारने का प्रयास है। मेरे पास मालो असबाब न हो न सही पर मेरे पास मेरी ख़ुद्दारी का ख़ज़ाना है। और ये बताने के पीछे मेरा सिर्फ़ इतना ही मक़सद है कि मुझे किसी बात का मलाल नहीं (पहले शेर में ही व्यक्त कर दिया है) मेरे पास जो है मुझे उसी पर फ़ख़्र है। आपकी प्रोत्साहित करती समालोचना के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करना अत्यंत आवश्यक है।

Alka Gupta के द्वारा
October 29, 2011

वाहिद जी , बहुत ही सुन्दर….पंक्तियाँ….. खड़े ज़िन्दगी के चौक पर सोचा तो पाया उम्र से इस हूँ खुशनसीब जो कुछ अनमोल लम्हे छंट सका ग़ज़ल ही भावात्मक है बहुत ही बढ़िया….

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 30, 2011

    आदरणीया अलका जी, जहाँ भाव ही नहीं वो गीत कैसा, और जहाँ स्नेह ही नहीं वो मीत कैसा; आपकी प्रोत्साह्नायुक्त प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार,

abodhbaalak के द्वारा
October 29, 2011

“तेरी गजलो की गहराइयों की हद कितनी है, कोशिश की पर मै उस तलक जा ना सका” एक और बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल वाहिद भाई, बस दिल ……….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    आपने भी पकड़ ही लिया अबोध भाई.. मेरा मतलब ग़ज़ल की तर्ज़ से था। बस जो समझ में आता है लिखता चला जाता हूँ ये तो आप ही लोग हैं जो मेरे हौसलों को नित नए परवाज़ देते रहते हैं। अब आपने कहा है तो……… ;)

vinitashukla के द्वारा
October 29, 2011

“न हो सका ख़ुशी में शामिल तो मलाल नहीं शुक्र है ग़म तो किसी का मैं यहाँ बाँट सका” मन के गहरे जज्बातों को, बड़ी ख़ूबसूरती से शब्द दिए हैं, आपने अपनी इस रचना में. बधाई.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    आदरणीया विनीता जी, बस हृदय के उद्गार हैं जो शब्दरूप में प्रकट हो गए। प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए आपका शुक्रगुज़ार हूँ।

राही अंजान के द्वारा
October 29, 2011

वाहिद भाई, आदाब !! वैसे तो हर शेर अपने आप में बहुत ही खूबसूरत और मुकम्मल है लेकिन अंतिम शेर तो दिल के पार ही हो गया ! बहुत ही सुंदर प्रयास ! आभार सहित !!

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    अनजानी राह के अजनबी राही, तुम इतने पहचाने से क्यूँ लगते हो। मैं तो एक तुच्छ जीव मात्र हूँ। आप लोगों से ही सीखने को मिलता है। आख़िरी शेर ही मेरी पहली पसंद भी है। प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए आभार संदीप जी।

manoranjan thakur के द्वारा
October 29, 2011

वास्तविकता को टटोलती सुंदर रचना

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    लघु प्रतिक्रिया में ही आपने सारतत्व दे दिया। आभार मनोरंजन जी।

Dr. SHASHIBHUSHAN के द्वारा
October 29, 2011

बेमिशाल भाव, बेमिशाल शब्द-संयोजन, भूखे को जैसे मिल गया हो पेट भर भोजन। लिखते रहें आप यूँ ही, हम सदा पढते रहें, जिन्दगी की राह में आगे सदा बढते रहें।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    आपका बहुत-बहुत शुक्रिया डॉ. साहब, आज पहली बार आपकी काव्यात्मक प्रतिक्रिया पाकर सुखद अनुभूति हुई। आपकी पंक्तियों में भी बहुत दम है।

आर.एन. शाही के द्वारा
October 29, 2011

वो मेरा दोस्त था क़रीब फिर भी दूर बहुत जो फ़ासिले थे दरमियाँ न उन्हें पाट सका; आज हूँ तंगहाल-तंगदस्त क्यूँ, जानते हो? मेरा ख़ुद्दार ज़मीर तलवे कभी न चाट सका; …… बहुत खूब वाहिद जी ! काश कि मुझे काव्य की कुछ विशेष समझ होती, तो शायद चन्द अल्फ़ाज़ और बयां कर पाता । फ़िर भी, इतना तो कहूंगा ही- नाक़ाबिल-ए-तारीफ़ !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    आदरणीय शाही जी, आपने मेरी ग़ज़ल में से मेरे दो सबसे पसंदीदा अशआर चुने हैं। आपके शब्द ज्ञान और भाषाई दक्षता से मैंने बहुत कुछ सीखा है। तो आपको काव्य की समझ नहीं है कम से कम मैं तो ऐसा नहीं मानता। फिर भी आपको याद दिलाना चाहूँगा कि कभी आपने ही स्वयं कहा था कि - यारों मैं भी कवि हूँ, तो अब उस कथन से मुकरें नहीं। एक विचार ने एक दिन अचानक ही मन में जन्म लिया कि सामान्यतः ग़ज़ल वग़ैरह में एक से ही काफ़िये देखने को मिलते हैं तो इस बार कुछ अलग करने की सोची और देखिये सचमुच में एक अलग ही चीज़ सामने आ गयी। सादर नमन सहित,

    आर. एन. शाही के द्वारा
    October 29, 2011

    ‘यारो मैं भी कवि हूं’ मेरे मन की व्यथा ही तो थी, कथन कहां था । एक होती है ग़ज़ल, सुना और पढ़ा है, परन्तु उसके ‘क़ाफ़िये’ भी होते हैं, यह लब्ज़ ही मुझे डराने के लिये काफ़ी है । शेष कुशल है, पोल-पट्टी को पर्दे में ही रहने दें तो अच्छा होगा । शुक्रिया !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    हमारे होते हुए आप इतना भी लाभ न उठा सकें गुरुवर तब तो जे जे के मंच पर की गयी सारी साधना ही निष्फल हो गयी। और कभी कभी व्यथा ही एक शानदार रूप धारण करके काव्य के रूप में अवतरित हो जाती है। आपकी वह कविता और मेरी ये ग़ज़ल भी एक व्यथा का ही शाब्दिक अवतरण है और कुछ नहीं। मेरी वय से अधिक तो आपका अनुभव है फिर भी एक लोटा पानी बन कर आपके अथाह समुन्दर में मिल जाऊं तो ये सौभाग्य ही कहलाएगा। साभार,

राजेंद्र भारद्वाज के द्वारा
October 29, 2011

अफ़सोस ताउम्र रहा कि दोस्त मुझे समझ न सके, दो लम्हे भी सुकूं के यहाँ मैं काट न सका….

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    भईया को सादर प्रणाम, अंततः मैं आपको खींच ही लाया। ज़िंदगी की क्या कहें कुछ ऐसा ही हाल इधर भी है, जो मुझे समझता रहा उसे पहचान नहीं पाया और जिसे समझाने की कोशिशों में लगा रहा वो इससे इंकार ही करता रहा। एक दिन यूँ ही बैठे-ठाले दिमाग़ी घोड़े बेकाबू हो उठे तो मैंने भी उन्हें स्वछन्द विचरण के लिए छोड़ दिया और जब वे लौट कर आये तो ये ग़ज़ल मेरी लेखन पुस्तिका में दर्ज हो चुकी थी। शुक्रिया आपका इस ५/५ के लिए (वैसे बात आपकी हो तो ये सब उतना मायने नहीं रखता क्यूंकि आप मेरे लिए कैसी सोच रखते वो केवल मैं ही जान सकता हूँ) ओह..औपचारिकता तो मंच की परम्परा है तो इसे निभा दूँ.. प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आपका ;)

Santosh Kumar के द्वारा
October 29, 2011

वाहिद भाई जी,.सादर नमस्कार आप जैसे श्रेष्ठ रचनाकार की कलम से निकली लाजबाब रचनाओं में मुझ मूरख को कई बार गहरी पीड़ा नजर आ जाती है ,….सच कहूं तो मुझे कविताओं/गजलों की प्रशंशा का शऊर नहीं है …बस भावनाओं को समझ लेना… अपनी औकात से बढ़कर एक बात कहूँगा ,. …ये तंगहाली-तंगदस्ती हमेशा याद जरूर रखना …बाद में यह याद ही खुद्दारी बनाये रखती है…सादर आभार

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    नमस्कार संतोष भाई, रचनाकार तो हूँ पर श्रेष्ठता इत्यादि का फ़ैसला तो आप ही लोगों को करना होता है। अपने बड़े भाई की देखादेखी लिखने का शौक़ कक्षा ६ में अध्ययन के दौरान ही चर्रा गया था और माँ वाग्देवी की असीम अनुकम्पा ने मुझ तुच्छ जीव को भी आप लोगों के स्नेह का पात्र बना दिया। कवि का हृदय संवेदनशील होना नितांत अनिवार्य है अन्यथा वो एक तुकबाज़ से ज़्यादा कुछ नहीं हो सकता। जो कुछ भी इस जीवनकाल में देखा और महसूस किया वो अपनेआप ही शब्दरूप में काग़ज़ पर उतर आया। किसी गद्य रचना के भावों को समझ लेने से बड़ी प्रशंसा कुछ हो ही नहीं सकती और आप इस कसौटी पर सर्वथा खरे उतरे हैं। और रही ख़ुद्दारी की बात तो मेरी अंतरात्मा में कुछ इस क़दर रची बसी है कि चाह कर भी उसे अलग नहीं कर सकता। और जब विपरीत परिस्थितियों में भी ये हौसला टूट नहीं पाया तो अनुकूलता के समय में इसे भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

nishamittal के द्वारा
October 29, 2011

संदीप जी बहुत ही सुन्दर रचना एवं भाव विशेष रूप से अंतिम पंक्तियों ने मुझको प्रभावित किया.आज हूँ तंगहाल-तंगदस्त क्यूँ, जानते हो? मेरा ख़ुद्दार ज़मीर तलवे कभी न चाट सका;

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    आदरणीया निशा जी सादर प्रणाम, आपने ग़ज़ल के जिस शेर का उल्लेख किया है वो मेरा भी पसंदीदा है। आपका हार्दिक धन्यवाद आशीर्वाद रुपी प्रतिक्रिया के लिए।

akraktale के द्वारा
October 29, 2011

आदरणीय वाहिद जी नमस्कार,                             बहुत तन्हा महसूस कराती रचना.वो मेरा दोस्त था क़रीब फिर भी दूर बहुत जो फ़ासिले थे दरमियाँ न उन्हें पाट सका; बधाई.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    अशोक भाई नमस्कार, सबसे पहले तो ये कहूँगा कि ये आदरणीय जैसे संबोधन न लगाया करें क्यूंकि मैं इसके योग्य नहीं हूँ। लेखकीय मंच पर मेरे लिए सभी एक समान हैं और मैं ऐसे संबोधन केवल वरिष्ठता के आधार पर करता हूँ। अब बात ग़ज़ल की - कवि की रचनाएँ कल्पना से ही उपजती हैं पर उनमें कहीं न कहीं यथार्थ की छाप भी होती ही है। ग़ज़ल आपको पसंद आई इसके लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ।

Paarth Dixit के द्वारा
October 29, 2011

संदीप जी,नमस्कार..कविता पढ़ने के बाद एक शब्द का प्रयोग करने से खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ..गजब की कविता पढ़ के दिल खुश हो गया खास तौर पर ये पंक्तिया..”आज हूँ तंगहाल-तंगदस्त क्यूँ, जानते हो? मेरा ख़ुद्दार ज़मीर तलवे कभी न चाट सका” मज़ा आगया पढ़ कर ऐसे ही लिखते रहे..

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    October 29, 2011

    शुक्रिया पार्थ जी। ये अंतिम शेर मेरा भी पसंदीदा है मेरी इस ग़ज़ल का। सराहना के लिए आभारी हूँ।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 12, 2011

    मिश्र जी, आप को पहली बार अपने ब्लॉग पर देखा और आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर बेइंतहा ख़ुशी हुई। आप ग़ज़ल का अच्छा इल्म रखते हैं ऐसा मुझे प्रतीत हो रहा है। बहरहाल प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।


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