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"फ़सल ख़्वाब की"

Posted On: 15 Nov, 2011 में

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नींद के खेतों में हम हरदम

फ़सल ख़्वाब की बोते थे,
माँ की गोद में सर रख कर हम
सारी रातें सोते थे;


आज नहीं है कोई सपना रातें
ख़ाली-ख़ाली सी,
बचपन की छोटी रातों में

सपन सजीले होते थे;


अंतरतम में प्यास दहकती किस विधि
तृप्त करूँ इसको,
ओस की बूंदों से हर सुबह हम

बोझिल पलकें धोते थे;


हर ख़्वाहिश पूरी है लेकिन फिर भी सुकूँ
नहीं अब दिल को,
तब दिल इतना बड़ा था कि हर

छोटी ख़ुशी संजोते थे;


आज ये आलम के काटो तो किसी भी
रग में ख़ून नहीं,
छोटी सी झिड़की पर तब हम
घंटों-घंटों रोते थे;


प्यार के बादल का छोटा सा टुकड़ा भी
द्रष्टव्य नहीं,

जिसकी बारिश में हम सबको

सारा वक़्त भिगोते थे;


कहाँ गई वो पौध स्नेह की, कहाँ प्रेम
की हरियाली,
कई बरस तक जिनकी ख़ातिर ये
बंजर खेत भी जोते थे;


लौट नहीं पाया वो बचपन, यौवन लक्ष
हुए क़ुर्बान,
जब घर में राहत पाकर हम
सारे रंजो-ग़म खोते थे;

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96 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

अलीन के द्वारा
February 5, 2012

असल्लाम वल्लेकुम, वाहिद साहब! “लौट नहीं पाया वो बचपन, यौवन लक्ष हुए क़ुर्बान”…….बचपन के ख्वाब और यौवन के दर्द को वयां करती पंक्तियाँ…काबिल-ए-तारीफ

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 6, 2012

    वालेकूमत सलाम। आपकी पहली टिप्पणी के लिए तहे दिल से शुक्रिया अदा करता हूँ।

Rakesh के द्वारा
January 30, 2012

हर एक शब्द ‘Nostalgic’ है. बहुत खूब.

dineshaastik के द्वारा
December 21, 2011

वाहिद जी प्रथम अभिवादन एवं सुन्दर रचना तथा प्रेरक रचना के लिये बधाई के साथ आभार भी।  http://dineshaastik.jagranjunction.com/

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    December 23, 2011

    दिनेश जी, मंच एवं मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है। प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए आभारी हूँ।

sadhana thakur के द्वारा
December 18, 2011

कृपया सुकन्या नहीं साधना पढ़े ………..

sukanyathakur के द्वारा
December 12, 2011

वाहिद भाई देर से प्रतिक्रिया देने के लिए मांफी चाहती हूँ ..मंच से ही दूर थी ..बहुत ही बेहतरीन कविता .मन को भिगो गई ..बधाई हो……..

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    December 13, 2011

    ऐसा कुछ नहीं है बहन आप देर-सबेर ही सही यहाँ तक आईं यही मेरे लिए अत्यधिक हर्ष का विषय है। आपका हार्दिक आभार,

Baijnath Pandey के द्वारा
November 22, 2011

स्नेही अग्रज श्री वाहिद जी, अभिवादन | “आज ये आलम के काटो तो किसी भी रग में ख़ून नहीं, छोटी सी झिड़की पर तब हम घंटों-घंटों रोते थे;”…………………..बस इतना कहूँगा कालजयी रचना है | दिल को गहरे तक भेद गई | बधाई |

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 22, 2011

    बस बचपन की कुछ यादें थीं जो आज के दौर में याद आ गयीं और ये कविता बाहर निकल पड़ी। प्रिय अनुज की बधाई सहर्ष स्वीकार है। साभार,

manoranjanthakur के द्वारा
November 19, 2011

लोगो को ललकारती सम्बल देती रचना

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 20, 2011

    प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार मनोरंजन जी।

Abdul Rashid के द्वारा
November 19, 2011

नींद के खेतों में हम हरदम फ़सल ख़्वाब की बोते थे, माँ की गोद में सर रख कर हम सारी रातें सोते थे; वाहिद जी अस्सलामोअलैकुम नफरत का दौर है इंसानियत लाचार है और कुदरत मौन है अब जिंदगी वैसी नही रही जैसी हुआ करती थी सुन्दर रचना दिल को छू गया सप्रेम अब्दुल रशीद

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 19, 2011

    वालेकूमत सलाम राशिद भाई! आपने बिलकुल ठीक कहा कि आज का दौर बदला हुआ है। मसला ये है कि ऐसा क्यूँ है, क्या हम ख़ुद नहीं बदल गए तब की बनिस्बत? वैसे मेरा मानना है कि एक बार फिर वही पुराना दौर लौट कर आएगा भले ही बचपन का वा सुहाना मौसम नहीं लौटने वाला।  प्रेमपूर्ण प्रतिक्रिया के लिए आपका आभारी हूँ।

November 19, 2011

वाहिद भाई॥बहुत खूबसूरत रचना  और शब्दों का चयन के तो क्या कहने ॥अच्छे विचारों के साथ अगर सही शब्द मिल जाये और उनकी सटीक संरचना बन जाये तो क्या कहने। जैसे खूबसूरत , खुशबूदार फूलों का हार …वैसे तो सभी पंक्तियाँ जानदार है पर ये पंक्ति कुछ ज्यादा ही अच्छी लगी…”हर ख़्वाहिश पूरी है लेकिन फिर भी सुकूँ नहीं अब दिल को, तब दिल इतना बड़ा था कि हर छोटी ख़ुशी संजोते थे।” बधाई !!

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 19, 2011

    स्वागतम डॉ. साहिब, गूढ़ शब्दों और अलंकरणों के प्रयोग से कुछ अव्वल दर्जे की रचनाएँ बनती हैं। पर व्यक्तिगत रूप से मैं सरल शब्दों और सीमित परिधि के अंदर रह कर अपनी बात कहने की कोशिश करता हूँ ताके वो सहज ही ग्राह्य हो। सुनहरे बचपन और कड़वाहट भरे आज के बीच के फ़र्क़ को ढूँढने का एक छोटा सा प्रयास किया था जो आप सभी को पसंद आया। प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से शुक्रिया।

allrounder के द्वारा
November 18, 2011

वाहिद जी, लाजवाव कृति ! बचपन की न जाने कितनी यादें ताजा कर गई ! अदभुत रचना पर हार्दिक बधाई !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 19, 2011

    सचिन भाई नमस्कार! बड़े दिनों बाद आपके दर्शन हुए इस मंच पर। शायद कहीं व्यस्त हैं आप। उम्मीद करता हूँ कि आपकी हरफ़नमौला अदाओं से जल्द ही रूबरू होने का मौक़ा मिलेगा। लंबे समय बाद की गयी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार।

Piyush Kumar Pant के द्वारा
November 17, 2011

भाई वाहिद जी…….. आपकी ये रचना पहले (कल ही) पढ़ ली थी….. पर समयाभाव के कारण प्रतिक्रिया न दे सका….. मेरा मत है की आप लोगों (जिनके हम पूर्व से प्रसंसक है….)की रचनाओं को प्रतिक्रियाओं से अब कोई फर्क नहीं पड़ना है……. पर हाँ आप लोगों की रचना मे प्रतिक्रिया लिख कर खुद को गौरवान्वित करने का एक अवसर मिल जाता है…. हर बार की तरह बेहतरीन रचना……..

    rajkamal के द्वारा
    November 17, 2011

    पड़ता है मेरे भाई ! फर्क जरूर पड़ता है ….. जितनी बार भी गले मिलोगे (पड़ोगे ) एक अलग ही और अनोखे ही एहसास से रूबरू होंगे आप …. आप की नमकीन भुजिया ने इस सारे मंच पर प्यार की मिठास बिखेर दी थी ….. आप दोनों हस्तियों (धुरन्धरो ) को मेरा भी सलाम ! नमस्कार ! आदाब ! अभिनन्दन ! और आभार !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 18, 2011

    पीयूष भाई नमस्कार, आपके पास समय की कमी रहती है इस तथ्य से मैं भलीभांति परिचित हूँ। मेरे दृष्टिकोण से प्रतिक्रिया से केवल एक फ़र्क़ पड़ता है कि - अपनी ख़ुबियों और ख़ामियों दोनों को ही जानने का अवसर प्राप्त होता है। कोई यूँ ही तारीफ़ कर के चला जाए तो अच्छा तो लगता है मगर जब कोई उसमें से कोई कमी ढूंढ निकालता है तो और भी अच्छा लगता है कि किसी ने इतने ध्यान से मेरी रचना पर दृष्टिपात किया और उसकी त्रुटियों की ओर इंगित भी किया। दूसरे जब कोई रचना के मर्म या सार को पकड़ लेता है तो भी प्रसन्नता होती है।  आप स्वयं ही एक प्रबुद्ध रचनाकार हैं और इसका प्रमाण कोई इंसान नहीं आपकी रचनाएँ स्वतः ही हैं। धन्यवाद आपका प्रोत्साहन के लिए।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 18, 2011

    राजकमल भाई आदाब, मेरे कुछ कहने के पहले ही आपने पीयूष भाई को इतना अच्छा उत्तर दे दिया। तरह-तरह के स्वादों से भरपूर आपकी यह प्रतिक्रिया सचमुच ज़ायकेदार रही। आपका शुक्रिया, और आभार दोनों ही व्यक्त करूँगा।

div81 के द्वारा
November 17, 2011

जब छोटी थी तो हमेश ये ही सोचती थी कि बड़ा होना ज्यादा हितकर है , मगर आज समझी हूँ कि अपना वो मस्तमौला बचपन सबसे अच्छा था | यादो के झरोखों से बचपन देखना (पढ़ना) बहुत पसंद आया | “हमेशा की तरह उम्दा ग़ज़ल” ये कहना तो सूरज को दिया दिखाने जैसा होगा मगर ये दस्तूर है तो ये ही सही बेहतरीन ग़ज़ल के लिए अनेको अनेक बधाई :)

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 17, 2011

    दिव्या जी नमस्कार, सच कहा आपने। यही इंसानी फ़ितरत है कि जो उसके पास होता है उसकी क़ीमत वो नहीं समझता, कुछ और पाने की ख़्वाहिश रखता है। मगर जब वो मिल जाता है तो उसे समझ आता है कि जो उसके पास पहले था और जिसे अब वो खो चुका है वो किसी ख़ज़ाने से कम नहीं था। प्रोत्साहन बढ़ाने और रचना को अपना क़ीमती वक़्त देने के लिए आपका शुक्रगुज़ार रहूँगा। :)

    santosh kumar के द्वारा
    November 19, 2011

    बहुत ही अच्छा सार्थक संवाद ,…छोटे थे तो बड़े होने की बेसब्री ,….बड़े हुए तो बचपन जाने की मायूसी ….कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता..

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 19, 2011

    हाँ संतोष भाई। मुकम्मल जहाँ भले ही न मिला हो पर जो उसी में आपके नाम की तरह संतोष कर लेना भी बड़ा अच्छा होता है। शुक्रिया,

rita singh 'sarjana' के द्वारा
November 17, 2011

वाह वाहिद जी ,बहुत खूब ,सुन्दर लाइने “कहाँ गई वो पौध स्नेह की, कहाँ प्रेम की हरियाली, कई बरस तक जिनकी ख़ातिर ये बंजर खेत भी जोते थे;” बधाई l

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 17, 2011

    प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद रीता जी।

akraktale के द्वारा
November 16, 2011

वाहिद जी बचपन की यादों को संजोये बहुत ही उम्दा रचना. प्यार के बादल का छोटा सा टुकड़ा भी द्रष्टव्य नहीं, जिसकी बारिश में हम सबको सारा वक़्त भिगोते थे; बधाई.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    प्रोत्साहन देती प्रतिक्रिया के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया अशोक जी।

sdvajpayee के द्वारा
November 16, 2011

  कितनी सरलता-सहजता से आप ने भूत,वर्तमान और तदर्न्‍तनिहित भविष्‍य का जीवंत चित्रण्‍ा कर दिया है। समाज की घटती संवेदनशीलता और आत्‍मकेन्द्रितता की बढती खतरनाक प्रवृत्ति हमें कहां ले जा रही है, आप के इस काव्‍य-सृजन से आसानी से समझा जा सकता है। जगाने,झकझोकरने , सोचने, विचारने और कुछ सकारात्‍मक करने  को प्रेरित करने का महत उद्देश्‍य लेकर चलती हुई कविता के लिए हार्दिक सम्‍मान श्री संदीप जी।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    वाजपेयी सर प्रणाम, अपने छोटे से जीवनकाल में जो कुछ देखा, सुना व अनुभव किया और इस सब के पश्चात् जो निष्कर्ष मिला उसे ही सीधेसाधे शब्दों में व्यक्त करने का एक तुच्छ प्रयास किया है। अपनी ही तरह अन्य कईयों को भी ऐसे हालात से जूझते देखा है। आपसे सम्मान प्राप्त होना पुरस्कृत होने जैसा है। सादर नमन समेत,

Vasudev Tripathi के द्वारा
November 16, 2011

बड़े भाई, परीक्षाएं चल रहीं हैं इस समय, विद्यालय से वापस आने के बाद सोचा कि आपने किसी रचना में अनुलग्न किया था अर्थात एक नयी कृति उपलब्ध है रसानंद के लिए, आपकी रचना पढ़ते पढ़ते बचपन की परीक्षाएं ही स्मरण हो आयीं| मैं तो स्वभावेन हर कुछ अंतराल पर दोहराता रहता हूँ- दिवस जात नहिं लागहि बारा… समय यथार्थ का तुमुलनाद है, यही यथार्थ है| दिनमपि रजनी सायं प्रातः, शिशिर वसंतौ पुनरःयातः। कालः क्रीड़ति गच्छत्यायुः, तदपि न मुंचत्याशाः वायुः॥ ……उत्कृष्ट रचना पर हार्दिक बधाई॥

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    प्रिय अनुज वासुदेव जी, आपकी परीक्षाएं बहुत ही अच्छी जा रही होंगी ऐसा मेरा विश्वास है। अध्ययन और पुनरावलोकन के इस समय में कुछ समय रंजन हेतु भी निकाल लेना अच्छा रहता है। हम सबके साथ एक न एक बार तो ऐसा हुआ ही होगा बचपन में जब परीक्षा के दिन किसी कारण विशेष से हम या तो विलम्ब से पहुंचे या उपस्थित ही नहीं हो पाए। आपकी बधाई सहर्ष स्वीकार है और उसके लिए आपका आभारी हूँ।

November 16, 2011

बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई और ५/५…. सब कुछ पा के भी क्यों अब, लगती ये दुनिया बेगानी है, फाकामस्ती में भी तब हम, दुनिया जेब में रखते थे|

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    भईया को प्रणाम, जड़ी उबालने के बाद जो औषधि का सार बच जाता है वो आपने प्रस्तुत कर दिया है। सोचने लगता हूँ कि ये आईडिया मेरे दिमाग में क्यूँ नहीं आया। आप हमेशा मेरे पांच से एक क़दम आगे ही रहेंगे। सादर,

Mahendra Kumar Arya के द्वारा
November 16, 2011

क्या बात है…स्कूल टाइम में खूब मजे लूटे है वो सब याद aa rhe hai

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    सही कहा महेंद्र। तपती धूप, बरसती बारिश, कड़कती ठण्ड जैसा भी मौसम रहा हो हमारे मज़ों में कभी कोई कमी नहीं आ पाई, ऊपरवाले का शुक्र है कि हम आज भी कभी-कभी उन पलों को साथ में जी पाते हैं। 

Sushil Kumar Rai के द्वारा
November 16, 2011

सही कहा दोस्त, हमने साथ-साथ कितने लम्हे बिताए हैं बचपन के.. उनकी खुशनुमा यादे अब भी दिल में ताज़ी हैं..

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    शुक्र है जनाब कि आप हिंदी पर तो आये। :) वो साइकिल से दूर दूर तक घूमना, घंटों तक मानस मंदिर में बैठना और वो क़िस्सागोई … सब कुछ ताज़ा है जैसे कल ही की बात हो। शुक्रिया यार।

rahulpriyadarshi के द्वारा
November 16, 2011

बचपन हर गम से बेगाना होता है….संवेदनाओं की बहुत ही कोमल अभिव्यक्ति हुई है…बहुत ही शानदार,यकीनन.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    राहुल जी, बचपन की वो सुनहरी यादगार ही तो है जो आज भी जीने की प्रेरणा देती है। आपका बहुत आभार,

shashibhushan1959 के द्वारा
November 15, 2011

मान्यवर वाहिद जी, सादर अभिवादन. जीवंत भाव, सशक्त रचना. वाकई बचपन जब यौवन में परिवर्तित होता है तो मासूमियत का स्थान कठोर यथार्थ ले लेता है, और वह बचपने के सम्पूर्ण माधुर्य को परिवर्तित कर देता है. अच्छी रचना के लिए धन्यवाद.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    आदरणीय शशिभूषण जी नमस्कार, आपने रचना के मर्म को समझा और उसे मेरे समक्ष व्यक्त कर दिया इससे बड़ा प्रोत्साहन व पुरस्कार किसी रचनाकार के लिए क्या होगा भला। मेरे भावों से समानता रखने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।

anamika के द्वारा
November 15, 2011

बहुत ही अच्छा लिखा आपने…….भावपूर्ण प्रस्तुति के लिए धन्यवाद

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    प्रोत्साहन के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया अनामिका जी।  साभार,

RaJ के द्वारा
November 15, 2011

वाहिद जी बड़ी ही बेहतरीन रचना , ऐसे ही लिखते रहिये की हम पड़ते रहे http://jrajeev.jagranjunction.com

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    राजीव जी नमस्कार, आपकी कई रचनाएँ पढ़ी हैं किन्तु दुर्भाग्यवश कभी भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने का अवसर नहीं प्राप्त हो पाया| आशा करता हूँ कि यह अवसर शीघ्र ही प्राप्त होगा| प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार,

November 15, 2011

वाहिद भाई, आदाब ! बहुत ही खूबसूरत रचना…..और मैं कहूँगा ‘सामयिक’ भी !! आपने तो स्व. जगजीत सिंह जी की ग़ज़ल “मुझको यकीं है सच कहती थीं, जो भी अम्मी कहती थीं….” की याद दिला दी । मेरी पसंदीदा ग़ज़लों में से एक है ये । बहुत बहुत आभार आपका…..हार्दिक बधाई !! :)

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    नमस्कार संदीप जी, आपने बिलकुल सही समझा, ये रचना कुछ हद तक उस नज़्म से ही प्रेरित है।  प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार,

suman dubey के द्वारा
November 15, 2011

वाहिद जी नमस्कार, भावपूर्ण अभिव्यक्ति कहां गई स्नेह पौध की——————————

neelamsingh के द्वारा
November 15, 2011

बचपन कभी कहीं जाता नहीं न मरता है वह हमारे भीतर ही रहता है | सुन्दर और भावपूर्ण पंक्तियाँ !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    चरणों में सादर प्रणाम अर्पित है , उसी अंदर के बचपन ने इन मन के विचारों को काग़ज़ पर शब्दों के रूप में साकार कराया है। आपके स्नेहिल वरदहस्त की छाया में सदैव ही अभिसिंचित होता रहूँगा ये मेरा विश्वास है।  नमनपूर्वक,

Rajkamal Sharma के द्वारा
November 15, 2011

– आज ये आलम के काटो तो किसी भी रग में ख़ून नहीं, प्रिय वाहिद भाई ….आदाब ! प्यारे गुरु भाई…… अलख निरंजन ! नमस्कार ! शुक्रिया ! स्वागत ! आदर ! अभिनन्दन ! और आभार ! जब भी मलेरिया चैक करवाने जाता हूँ नर्स चाहे कितनी भी सुन्दर क्यों न हो लेकिन खून पहली बार में कभी भी नहीं निकला बल्कि हर बार अनेको बार सुईया चुभोने पर ही निकल पाया है ….. इससे सिद्द होता है कि आपकी बात बिलकुल सत्य है ……हा हा हा हा हा हा मुबारकबाद और मंगलकामनाये न्ये साल तक आने वाले सभी त्योहारों की बधाई :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| http://rajkamal.jagranjunction.com/2011/11/11/राजकमल-इन-पञ्चकोटि-महामण/

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    प्रिय भाई साहब आदाब! शादियों की सिल्वर जुबली मना लेने के बाद आप क्या मलेरिया का भी सिल्वर जुबली मनाने की तैयारी कर चुके हैं? आपको अपने पुराने तेवरों में देख कर कितना अच्छा लग रहा है क्या कहूँ आपसे। थोक में बधाईओं से मेरा काम नहीं चलने वाला। हमें तो हर दिन की मुबारकबाद चाहिए। आपके प्रति आभार शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है। :-D

    Baijnath Pandey के द्वारा
    November 28, 2011

    भ्राता श्री, आपके ख्वाबों की फसल तो लहलहा रही है …….. :D वैसे अब आपकी कोई ग़ज़ल संकलन देखने की ललक जाग उठी है ………… कब पूरा कर रहे हैं अपने अनुज का अरमान ??? पुनश्च आभार इस अनमोल कृति के लिए !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 29, 2011

    प्रिय बैजनाथ भाई, मेरे ख़्वाबों की जो फ़सल लहलहा रही है उसमें आप सभी बंधुओं का महती योगदान नकारा नहीं जा सकता। ग़ज़लें तो आपकी भी ढेरों छुपी बैठी हैं। फ़िलहाल मैं स्वयं को इस योग्य नहीं समझता कि मेरी ग़ज़लों का कोई संकलन निकाला जा सके। वैसे मुझे आशा है कि देर-सबेर आपका यह अरमान इस रूप में नहीं तो किसी और रूप में तो पूरा होगा ही। शेष जब ऐसा कुछ हुआ तब देखा जाएगा। आपका तहे दिल से शुक्रिया पुनरावलोकन और सराहना के लिए। आशीर्वाद सहित,

Amita Srivastava के द्वारा
November 15, 2011

वाहिद भाई सलाम जितना इसको पढ़ते जाते , बचपन मे हम खोते जाते | जब थे लड़ते और उछलते , दिन बीतते हँसते गाते | मुबारकवाद

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    अमिता जी नमस्कार। आपकी काव्यात्मक प्रतिक्रिया से छलकते रंगों ने ख़ुश कर दिया। आपका हार्दिक धन्यवाद।

aftab azmat के द्वारा
November 15, 2011

बचपन की छोटी रातों में सपन सजीले होते थे;… बहुत सुन्दर जनाब…

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    आफ़ताब भाई, बहुत दिनों के बाद आपका आना हुआ इधर। ख़ुशामदीद। :D प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया।

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
November 15, 2011

प्रिय वाहिद भाई लाजबाब , हर एक पंक्तियाँ मन को छू गयी किस किस का उल्लेख करूँ..काश ये हमारी जन भावनाओं के खेतों तक पहुंचें और उनमे हरित क्रान्ति आ जाए ..अति सुंदर भ्रमर ५ हर ख़्वाहिश पूरी है लेकिन फिर भी सुकूँ नहीं अब दिल को, तब दिल इतना बड़ा था कि हर छोटी ख़ुशी संजोते थे; – आज ये आलम के काटो तो किसी भी रग में ख़ून नहीं, छोटी सी झिड़की पर तब हम घंटों-घंटों रोते थे;

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    प्रिय भ्रमर जी,  साधारण शब्दों में एक साधारण सी रचना है ये हाँ इसके पीछे जो भाव हैं वो मेरे लिए विशिष्ट हैं। आपकी दुआ क़ुबूल हो। आभार सहित,

abodhbaalak के द्वारा
November 15, 2011

वाहिद भाई, बेहतरीन ग़ज़ल, न केवल बचपन बलके अपने घर बार, अपने खेत खलिहान, अपने …………….. ग़ज़ल की बादशाहत ………………. :) http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    हाँ अबोध भाई बचपन की खट्टी-मीठी यादें बेइंतहा ख़ुशी तो देती हैं मगर जब उस वक़्त के गुज़र चुकने का अहसास होता है तो कुछ सालता भी है। ख़ाकसार को झाड़ पर …….  ;)

Dharmesh Tiwari के द्वारा
November 15, 2011

आदरणीय वाहिद जी सादर प्रणाम,,,,,,,,बचपन के दिनों की ओर ले जाती अति सुन्दर प्रस्तुती,,,,धन्यवाद!

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    प्रणाम धर्मेश भाई, बचपन के वो सुहाने दिन कहीं गए नहीं हैं हमारे दिल के किसी कोने में आज भी जस के तस मौजूद हैं। प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद,

utpal के द्वारा
November 15, 2011

वाहिद जी ! आपकी कविता पढ़कर इक नज़्म याद आ गयी मुझको यकीं है सच कहती थी, जो भी अम्मी कहती थी जब मेरे बचपन के दिन थे, चाँद मैं परियां रहती थी …… !! ………. एक ये दिन जब लाखों गम, और काल पड़ा है आँसू का एक वो दिन जब एक ज़रा सी, बात पे नदियाँ बहती थी :) …… और आपका ये छंद नींद के खेतों में हम हरदम फ़सल ख़्वाब की बोते थे, माँ की गोद में सर रख कर हम सारी रातें सोते थे; waaahhhhhh …………… क्या बात है ……….. इस चाँद से आपने हमें अपना मुरीद बना लिया लिखते रहिये ! उत्पल

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    प्रिय उत्पल जी, आपने बिलकुल सही पहचाना। मेरी ये रचना काफ़ी हद तक जावेद अख़्तर द्वारा लिखित और स्व. जगजीत सिंह जी द्वारा सुर एवं स्वरबद्ध उस नज़्म से प्रेरित है। मेरे दिल में कुछ ऐसी बातें थीं जिन्हें मैं व्यक्त करना चाहता था और ये नज़्म मुझे मौजूं लगती थी मगर मैं कुछ मौलिक प्रस्तुत करना चाहता था भले ही वो कहीं से प्रेरित हो। और नतीजा आपके सामने है। वो बचपन के ख़्वाब आज भी कहीं न कहीं ज़िंदा हैं और उनकी लहलहाती फ़सल आज भी ताज़गी से भर देती है। प्रशंसा एवं प्रोत्साहन के लिए आपका आभार। वक़्त मिले तो कुछ पिछली रचनाओं पर भी नज़र डालें।

    utpal के द्वारा
    November 15, 2011

    वाहिद जी ! आभारी हूँ की आपने मेरीकथनी पर ध्यान दिया ! मैं ऐसा मानता हूँ कि ग़ज़ल और नज़्म कि जमीन चाहे किसी कि भी हो, या कुछ भी हो, उसमें रंग हमेशा नए भरे जानें चाहिए ! जमीन पर बीज आत्मा से जब बोया जाता है तो नयी बात ह होती है …. जैसा आपके इस नज़्म मैं यहाँ है ! दिल को छु गयी है आपकी ये नज़्म , आप सचमुच बधाई के पात्र हैं ! साभार

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 16, 2011

    उत्पल जी, मैं अपने ब्लॉग पर आई हर एक प्रतिक्रिया पर समुचित ध्यान देने का प्रयास करता हूँ। आपने मान और सराहना दोनों ही  मुझे भरपूर दिए हैं जिसके लिए आपका तहेदिल से शुक्रगुज़ार हूँ। हमारे बीच एक दूसरे की रचनाओं का आस्वादन इसी प्रकार से चलता रहेगा। पुनश्चः धन्यवाद के साथ,

mparveen के द्वारा
November 15, 2011

वाहिद जी नमस्कार, आपकी कविता पढ़ के कुछ पल के लिए बचपन में चले गए .. क्या दिन थे वो भी ……. काश !! वो बचपन लौट के आ पाता… बहुत खूबसूरत रचना है. बधाई हो आपको…

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    खुशामदीद परवीन जी।  ये कविता मैंने भी ऐसे ही पलों में लिखी थी जब मैं बचपन के समंदर में गोते खा रहा था। जो लौट नहीं सकता उसके लिए क्या कामना करना हाँ उन सुनहरी यादों से प्रेरणा लेकर वर्तमान और अतीत को सुखद बनाने का एक प्रयास ज़रूर किया जा सकता है। आभार आपका,

munish के द्वारा
November 15, 2011

मजबूर हूँ की फाइव स्टार से ज्यादा नहीं दे सकता

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    आपकी ये मजबूरी तो मेरे लिए एक सुखद अहसास ले कर आई है मुनीश भाई। आपका हार्दिक आभार। :-)

Paarth Dixit के द्वारा
November 15, 2011

संदीप जी, नमस्कार… ज्यादा क्या कहू…बस इतना ही कहना चाहूँगा …आपकी इस सुन्दर कविता ने एक बार फिर उस प्यारे बचपन कि याद दिला दी..बहुत अच्छी कविता…एवं पंक्तिया तो बिलकुल जीवंत है..सच में कितना सुन्दर होता है बचपन…आपका बहुत-बहुत आभार.. http://www.paarth.jagranjunction.com

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    वो बचपन ही तो है पार्थ जी जो अब भी इन तमाम झंझावातों के बीच भी जीवन की जिजीविषा को बचाए रखे है। शुक्रिया आपका प्रतिक्रिया के लिए।

satya sheel agrawal के द्वारा
November 15, 2011

वाहिद जी सुन्दर रचना के लिए बधाई.कृपया मेरे ब्लॉग पढ़ कर अपनी राय भेजें (जरा सोचिये )अपने विचार मेरी ईमेल इ डी पर भी भेज सकते हैं जो है, SATYASHEEL129@GMAIL.COM

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    आदरणीय सत्यशील जी नमस्कार, आपके ब्लॉग पर शीघ्र ही उपस्थित होने का प्रयास करता हूँ। प्रतिक्रिया के लिए आपका आभार,

vinitashukla के द्वारा
November 15, 2011

बचपन के सुनहरे पल हाथ से फिसल जाते हैं और मन कसकता ही रह जाता है. सुन्दर और मार्मिक अभिव्यक्ति के लिए बधाई.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    आदरणीया विनीता जी प्रणाम, एक ग़ज़ल थी - दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है। जब बचपन था तो उसके मूल्य से परिचय नहीं था और आज जब वो नहीं है तो उसकी कमी बुरी तरह से सालती है।  प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

minujha के द्वारा
November 15, 2011

बहुत सुंदर कविता ,वाहिद जी  शांति और सुकून का एहसास हुआ पढकर,काश वो समय वापस आ पाता…………..

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    नमस्ते मीनू जी, मन के अंदर कहीं गहरे यह इच्छा तो दबी ही हुई है कि काश वो समय वापिस आ पाता ये जानते हुए भी कि ऐसा किसी भी तरह से संभव नहीं है। पर उन दिनों को स्मरण करके जो सुखद अनुभूति होती है वो एक नयी ऊर्जा का संचार करती है। साभार,

alkargupta1 के द्वारा
November 15, 2011

वाहिद जी , रचना पढ़ते -पढ़ते बचपन में कहीं खो गयी….कितना प्यार दुलार ममत्त्व की छाया सभी कुछ….पर यह बचपन .लौट नहीं पाता…….भावपूर्ण अप्रतिम काव्य रचना |

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    आदरणीया अलका जी सादर प्रणाम, जब यह रचना काग़ज़ पर अपना आकार ले रही थी तब मैं भी अपने बचपन में ही खोया हुआ था कि अचानक किसी बात पर मेरा ध्यान भंग हुआ और हृदय ने तब और अब के बीच एक तुलनात्मक विश्लेषण काव्य रूप में करने का प्रयास कर डाला। आपके स्नेह के लिए आभार जैसा शब्द भी छोटा है।

Santosh Kumar के द्वारा
November 15, 2011

वाहिद भाई जी ,.सादर नमन अब प्रतिक्रिया में क्या लिख दूं ?….खुद अपनी यादों में खो गया ,..रचना पढ़ सुबह सबेरे एक अद्भुत आनंद मिला….किसी एक पंक्ति को उद्धृत नहीं कर पा रहा हूँ सब लाजबाब हैं ,..फिर भी प्रयास करता हूँ हर ख़्वाहिश पूरी है लेकिन फिर भी सुकूँ नहीं अब दिल को, तब दिल इतना बड़ा था कि हर छोटी ख़ुशी संजोते थे; –…………….. आज ये आलम के काटो तो किसी भी रग में ख़ून नहीं, छोटी सी झिड़की पर तब हम घंटों-घंटों रोते थे;………………इस रचना में खुद को बहुत ज्यादा महसूस कर रहा हूँ ,….कोटि कोटि आभार ..नमन

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    प्रिय संतोष भाई, इस रचना को पढ़ कर आपको कुछ भी महसूस हुआ तो मेरा लिखना सार्थक हुआ। एक दिन यूँ ही बैठे-बैठे किसी बात पर अपने बचपन की बड़ी याद आई और उन्हीं क्षणों में इसका जन्म हुआ। आपकी प्रतिक्रिया आपकी संवेदनशीलता की पहचान है। धन्यवाद इस सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए,

nishamittal के द्वारा
November 15, 2011

संदीप जी बचपन लौट कर नहीं आता बहुत सुन्दर द्रवित करने वाली रचना बधाई विशेष रूप से अंतिम पंक्तियाँ कहाँ गई वो पौध स्नेह की, कहाँ प्रेम की हरियाली, कई बरस तक जिनकी ख़ातिर ये बंजर खेत भी जोते थे; – लौट नहीं पाया वो बचपन, यौवन लक्ष हुए क़ुर्बान, जब घर में राहत पाकर हम सारे रंजो-ग़म खोते थे; –

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    आदरणीया निशा जी, वो बचपन सचमुच लौट कर नहीं आता मगर उसमें जिए गए वे बेहतरीन पल जीवन को सुधारने के लिए उद्यत अवश्य करते हैं। उनसे प्रेरणा लेकर आत्मबल प्राप्त होता है। आभार आपका,

Rajesh Dubey के द्वारा
November 15, 2011

कहाँ गई वो पौध स्नेह की, कहाँ प्रेम की हरियाली, कई बरस तक जिनकी ख़ातिर ये बंजर खेत भी जोते थे भाई बहुत ही सुन्दर पंक्तिया है. धन-दौलत के लिए तो सब लोग लगे हुए हैं, पर प्रेम पाने की होड़ नहीं दिखती है.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    राजेश जी नमस्कार, आपसे प्रोत्साहन पाकर विचारों की मुखर प्रस्तुति का संबल मिला। हार्दिक आभार आपका,

Ramesh Bajpai के द्वारा
November 15, 2011

प्यार के बादल का छोटा सा टुकड़ा भी द्रष्टव्य नहीं, जिसकी बारिश में हम सबको सारा वक़्त भिगोते थे; प्रिय श्री वाहिद जी ममता की वे स्नेह पगी लोरिया व मम्मत्व भरे माँ के हाथो का जादुई स्पर्श अब यादो में ही रह गया | बाल मन के औदर्य ,व सपनों से पगी ये यादे इस तरह जिवंत कर आपने बहुत उपकार किया है | बहुत बहुत बधाई |

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    November 15, 2011

    बाजपेयी सर प्रणाम, वो बचपन की निश्छलता और वयस्कता की कटुता दोनों के बीच एक दिन फ़र्क़ करने बैठा तो अनायास ही ये पंक्तियाँ बनती चली गयीं। आपसे तो मैं ही आज तक उपकृत होता आया हूँ आपके प्रतिक्रिया रुपी आशीष के माध्यम से। वे यादें भी आनंददायक हैं जो जीवन को और बेहतर ढंग से जीने को प्रेरित करती हैं।  सादर एवं साभार,


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