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"वो तमाशा देखता है"

Posted On: 24 Feb, 2012 में

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——-

हारा ख़ुद को पर तुझे मैं जीत ना सका

हर लम्हा है अब तो देखो मेरी सांस सा रुका;

*

सोचता नहीं था मैं पर जब भी पूछा सोच कर

दे  दिया उसने मुझे वही जवाब एक टका;

*

है मुक़द्दस प्यार का जज़्बा ये मेरा ऐ हबीब

क्यूंकि इसमें है भरा सिर्फ़ो सिर्फ़ ज़िकर तेरा;

*

ज़िंदगी में तय किये हैं मुक़ां कई चलते हुए

इसलिए लगता है तुमको शख़्स ये थोड़ा थका;

*

कुछ न कुछ दे जाएँगे हम ख़ाक़ हो कर भी तुझे

जैसे पिस कर भी, हथेली, सुर्ख़ बनाए हिना;

*

है धुआँ-गर्दो ग़ुबार चार सू मुश्किल बड़ी

है ज़रुरी साँस लेना, चाहिए ताज़ा हवा;

*

बेसबब भटक रहा हूँ मैं तुझी को ढूँढता

काश  बता देती मुझे तू ज़िंदगी अपना पता;

*

देखा तुझको भी बहुत और शानो शौक़त भी तेरी

अब दिखाना है जो मुझको, तू अपनी दोस्ती दिखा;

*

हाँ गुज़ारी ज़िंदगी, है बहुत मिज़ाज से मगर

शौक़ बचपन का अभी है एक छोटा सा बचा;

*

बस भी कर कोई तवज्जह देने वाला है नहीं

राग जो छेड़ा है तूने, है सरासर बेतुका;

*

दिल दिया उसको ही मैंने, और जाँ भी नाम की

मुझको लेकिन इतने पर भी कहता है वो बेवफ़ा;

*

शमअ़ जलती है घरों में, रास्ते हैं स्याह क्यूँ

इन अंधेरे रास्तों में रौशन करो कोई दिया;

*

जिसको समझा सरपरस्त सर-ता-पा* ‘वाहिद’ यहाँ

वो तमाशा देखता है, मेरी बस्ती को जला;

———————————————-

*सर-ता-पा = सर से पैर तक, शुरू से आख़िर तक



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85 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mayankkumar के द्वारा
December 5, 2012

काफी वक्त के बाद ऐसी कलम मिली है ………. लेख सार्थक, रोचक !!! हमारे ब्लाॅग तक भी जावें … !!!

बनारसी बाबू के द्वारा
March 10, 2012

सादर प्रणाम, आप तो हमेशा से हमारे प्रेरणास्रोत रहे हैं| हर क्षेत्र में आपने ही हमें क, ख, ग, सिखाया है और आप ही ऐसा फ़ैसला ले रहे हैं तो हमारा क्या होगा| जवाब दीजिए|

dineshaastik के द्वारा
March 5, 2012

बेहतरीन गजल …बधाई एवं होली के रंगीन पर्व पर आपको सपरिवार शुभकामनायें। कृपया अपना समालोचात्मक प्रतिक्रिया से अनुग्रहीत करें- http://dineshaastik.jagranjunction.com/?p=60&preview=trueक्या सचमुच ईश्वर है (कुछ सवाल)

March 4, 2012

वाहिद भाई नमस्कार ! बहुत सुंदर ग़ज़ल प्रस्तुत की है आपने…अभी तक इसे पढ़ने से वंचित रह गया था । हर एक शेर लाजवाब है …खास कर ये शेर तो दिल के काफी अंदर तक छू गया: है धुआँ-गर्दो ग़ुबार चार सू मुश्किल बड़ी, है ज़रुरी साँस लेना, चाहिए ताज़ा हवा॥ बहुत बहुत बधाई हो इतनी सुंदर ग़ज़ल के लिए !!

MAHIMA SHREE के द्वारा
February 28, 2012

वाहिद जी नमस्कार , कमाल है…सभी पंक्तिया जिंदगी के अलग-२ रंग को बयाँ कर रही…है…पर सभी अलहदा होते हुए भी करीब है… “बेसबब भटक रहा हूँ मैं तुझी को ढूँढता काश बता देती मुझे तू ज़िंदगी अपना पता” “ज़िंदगी में तय किये हैं मुक़ां कई चलते हुए इसलिए लगता है तुमको शख़्स ये थोड़ा थका; वाह, वाह, वाह, ढेर सारी बधाईया… है आपको…. (पर कुछ पंक्तिया पुरानी गजलो से मेल खाती है ….ध्यान रखे …मेरी बात को अन्यथा न लें..)

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 28, 2012

    आपका आभार महिमा जी, अगर मौज़ूँ एक ही हो तो मेल खाने की संभावनाएं हो ही जाती हैं। सराहना के लिए धन्यवाद।

    sinsera के द्वारा
    February 29, 2012

    अनाधिकार चेष्टा के लिए क्षमा चाहती हूँ संदीप जी. “मौजूँ”शब्द का अर्थ होता है उपयुक्त, यहाँ पर आप यदि “मज़मून “शब्द का प्रयोग करें तो ज्यादा मौजूँ होगा…

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 29, 2012

    अनाधिकार चेष्टा जैसी कोई बात नहीं सरिता जी। ध्यानाकर्षण के लिए धन्यवाद मैंने वास्तव में भूल कर दी है। सुधारने के लिए आपका शुक्रिया।

नंदिनी के द्वारा
February 27, 2012

वाहिद जी नमस्कार, आपकी तो हर ग़ज़ल बेहतरीन होती है मगर ये वाली मुझे सबसे अच्छी लगी। जीवन के विभिन्न पड़ावों का आपने बड़ी सुंदरता के साथ बखान किया है। बहुत-बहुत बढ़िया।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 27, 2012

    नमस्ते नंदिनी जी, हौसला बढ़ाती प्रतिक्रिया के लिए आपका आभारी हूँ।

roshni के द्वारा
February 27, 2012

वाहिद जी नमस्कार देरी से प्रतिक्रिया के लिए माफ़ी चाहती हूँ … ग़ज़ल की हर पंक्ति एक नयी कहानी कहती हुई लग रही है … हाँ गुज़ारी ज़िंदगी, है बहुत मिज़ाज से मगर शौक़ बचपन का अभी है एक छोटा सा बचा;… बहुत ही सुंदर …. आभार

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 27, 2012

    रोशनी जी नमस्ते, माफ़ी की कोई ज़रूरत नहीं है मैं ही आपको टैग करना भूल गया था। नज़र पड़ी तो अपनी ग़लती को सुधारा। ग़ज़ल का मतलब ही है कि हर शेर का मौज़ूँ अलग-अलग हो। आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहती है। सराहना के लिए हार्दिक आभार,

rahulpriyadarshi के द्वारा
February 26, 2012

संदीप भाई,प्रणाम,आजकल जिंदगी की आपधामी में जरा उलझा हूँ,कभी फुर्सत में वक़्त नहीं निकाल पाता,आज संयोग से जागरण थोड़ी देर के लिए खोला और आपकी रचना सामने आ गयी,खुद को रोक नहीं सका,आप सच में दिन-ब-दिन और भी ज्यादा धारदार होते जा रहे हैं,ये निखार स्वागत योग्य है,बहुत लाजवाब,मजा आ गया :)

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 27, 2012

    प्रणाम राहुल जी, आप से सराहना मिलती है तो बड़ा अच्छा लगता है क्यूंकि मैं जानता हूँ कि आप वही करते हैं जो आपको ठीक लगता है। आपकी दृष्टि में मेरी लेखनी की धार बढ़ी है और वो निखर रही है ये जानकर बहुत ख़ुशी हुई। आपकी अमूल्य प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार।

आर.एन. शाही के द्वारा
February 26, 2012

टंगने की बधाइयाँ स्वीकार करें …

Dr S Shankar Singh के द्वारा
February 26, 2012

बहुत खूब

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 27, 2012

    अपना बहुमूल्य समय देने के लिए आपका हार्दिक आभार डॉ. साहब।

vasudev tripathi के द्वारा
February 26, 2012

वाहिद भाई कड़ी दर कड़ी आप गजलों का सिलसिला बढ़ाये जा रहे हैं और एक काफिला सा खड़ा कर दिया है..!!! यूँ ही लिखना जारी रहे और आपका काफिला बढ़ता रहे ताकि कभी-कभी इसके बींच आकर हम भी कहीं कलकल का आनंद ले लिया करें, बस थकिये नहीं ऐसी हमारी शुभाशंसा है…!!! :) ज़िंदगी में तय किये हैं मुक़ां कई चलते हुए इसलिए लगता है तुमको शख़्स ये थोड़ा थका;

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 26, 2012

    प्रिय अनुज वासुदेव जी, आप तो स्वयं ही इतने प्रतिभाशाली हैं। आप जानते ही हैं कि बूँद-बूँद कर के ही घड़ा भी भर जाता है। आप लोग जब सराहना और प्रशंसा करते हैं तो उससे मुझे काफ़ी हद तक सहारा मिलता है और मैं गिरने से बच जाता हूँ। अपनी इस साधना में मैं निरंतर लगा हुआ हूँ और आप लोगों की प्रतिक्रियाएं मेरे अंदर एक नवीन ऊर्जा का संचार करती हैं। थक जाता हूँ तो रुक कर थोड़ा आराम भी कर लेता हूँ मगर वो बहुत ही अल्प समय का विश्राम होता है। आपकी आह्लादित करती प्रतिक्रिया के लिए एक बहुत बड़ाऽऽऽऽऽऽऽ सा धन्यवाद। :-D

chandanrai के द्वारा
February 26, 2012

वाहिद भाई ,नमस्कार बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है . बहुत बहुत बधाई हो आपको !!!

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 26, 2012

    नमस्कार चन्दन जी, तारीफ़ के लिए तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूँ।

chandan Rai के द्वारा
February 26, 2012

खूबसूरत अंदाज अल्फ़ाज़   उम्दा  अभिव्यकि!

neelamsingh के द्वारा
February 25, 2012

वाहिद भाई देर से प्रतिक्रिया देने के लिए क्षमा चाहती हूँ आपकी रचना बहुत उम्दा है , काबिले तारीफ़ है , उर्दू भाषा पर आपका अच्छा अधिकार है कोमल भावों की अभिव्यकि के लिए जिस तरह के अल्फ़ाज़ चाहिए आपने वैसे शब्दों का ही प्रयोग किया है | एक अच्छी रचना के लिए बधाई !

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 26, 2012

    आप मुझसे क्षमा मांगेंगी तो मैं क्या मुंह दिखाऊंगा? क्षमा तो आप मुझे करेंगी जब मुझसे कोई ग़लती हो जाएगी। आपकी प्रतिक्रिया को हमेशा ही एक समीक्षा की तरह लेता हूँ और ये भी मानता हूँ कि आपसे बेहतर मेरी ख़ामी और नुक़्स कोई नहीं पहचान सकता। आप ने हमेशा ही आगे बढ़ने की राह दिखाई है और मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत रही हैं। नीली छतरी वाले से यही दुआ है कि आपका हाथ सदैव वरद मुद्रा में मेरे सर के ऊपर बना रहे। आपके प्रति मेरी भावनाओं के लिए आभार, धन्यवाद आदि शब्द बहुत छोटे पड़ जाते हैं। विनयावनत अनुज,

sadhana thakur के द्वारा
February 25, 2012

वाहिद भाई ,नमस्कार ,आप सब के वापस आने से मंच की शान ही बढ़ गई है ,बेहतर अल्फ़ाज ,खूबसूरत अंदाज से पेश की गई आपकी ये रचना शानदार है ,बधाई हो …..

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 26, 2012

    प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार साधना जी। आप सब की हौसला अफ़ज़ाई हमेशा ही बेहतर करने की तर्ग़ीब मिलती है। धन्यवाद,

mparveen के द्वारा
February 25, 2012

वाहिद जी नमस्कार, आपकी रचनाएँ तो होती ही नायाब हैं . बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है . बहुत बहुत बधाई हो आपको !!! बेसबब भटक रहा हूँ मैं तुझी को ढूँढता काश बता देती मुझे तू ज़िंदगी अपना पता; हारा ख़ुद को पर तुझे मैं जीत ना सका हर लम्हा है अब तो देखो मेरी सांस सा रुका; :) :) …………… *

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 26, 2012

    नमस्ते परवीन जी, सबकुछ ऊपर वाले की देन है मैं ज़र्रा भर हूँ। बाक़ी रही-सही क़सर आप सब सुधिजन पूरी कर देते हैं। प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आपका,

akraktale के द्वारा
February 25, 2012

संदीप जी नमस्कार, हारा ख़ुद को पर तुझे मैं जीत ना सका हर लम्हा है अब तो देखो मेरी सांस सा रुका; सदैव की भाँती सुन्दर गजल. बधाई.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    आदरणीय अशोक जी नमस्ते, आपसे सराहना पा कर हृदय प्रफुल्लित हुआ। धन्यवाद सहित,

chaatak के द्वारा
February 25, 2012

बहुत खूब, वाहिद जी हमेशा की ही तरह एक शानदार रचना! बधाई!

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    स्नेही बंधु चातक जी, हमेशा की तरह आपसे प्रशंसा के चंद अलफ़ाज़ पा कर बहुत ख़ुशी हुई। हार्दिक आभार आपका,

munish के द्वारा
February 25, 2012

शमअ़ जलती है घरों में, रास्ते हैं स्याह क्यूँ इन अंधेरे रास्तों में रौशन करो कोई दिया; ऐसा मन कर रहा है बार बार पढूं और पढता ही रहूँ. ( पता नहीं किस नासमझ ने स्टार देने में कंजूसी की है की ४/५ ही हो पा रहे हैं …..)

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    शुक्रिया मुनीश भाई, आपही की तरह एक दो और मित्रों ने भी शिक़ायत की है कि स्टार सिस्टम काम नहीं कर रहा। खैर जाने दीजिए स्टार न सही आपकी प्रेमपूर्ण प्रतिक्रिया ही मेरे लिए काफ़ी है। आपने इसे पढ़ा और सराहा इसके लिए तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आपका।

sinsera के द्वारा
February 25, 2012

संदीप जी नमस्कार, आपकी ग़ज़ल के बारे में तो कुछ नहीं कहूँ गी ,नीचे सभी लोग इतनी ज्यादा तारीफ कर चुके हैं कि मेरे लिए कुछ बचा ही नहीं. ये जो “बर्निंग शिप्स” की पिक आपने लगाई है ,वो ग़ज़ल के भाव के साथ बहुत मौज़ूँ है, असली तारीफ उसी की है.आप जानते ही होंगे कि यह फोटो २००४ में हार्पर कॉलिन्स द्वारा new illustrated edition of The Silmarillion में चर्चित हुई थी. आप का उर्दू ज्ञान काफी अच्छा है.लेकिन मुझे एक बात की शंका है. आप से पहले भी पूछा था, आप “वाहिद” का सही मतलब जानते हैं? कृपया बताइए..

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    सरिता जी नमस्ते! तस्वीर की बाबत यही कहूँगा कि बहुत देर तक सैकड़ों तस्वीरों को तलाशने के बाद मुझे यही तस्वीर बिलकुल मौज़ूँ लग रही थी। सामान्यतः मैं अपनी बनायी तस्वीरें लगाना ही पसंद करता हूँ पर समयाभाव के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता। आपके कथन से आपकी उच्च विचारों का पता चलता है साथ ही यह भी कहूँगा कि आपका सामान्य ज्ञान बहुत ही उन्नत है। अब बात भाषा की - जैसा कि हर भाषा में होता है कि एक ही शब्द के मायने अलग-अलग जगह और अलग-अलग परिस्थिति में बदल जाते हैं वैसा ही कुछ मेरे तख़ल्लुस के साथ भी है मैं आपको ‘वाहिद’ के जितने भी अर्थ जानता हूँ बता देता हूँ और मेरा ये तख़ल्लुस चुनने के पीछे क्या वजह थी ये भी बता देता हूँ। वाहिद का अर्थ होता है - एक, यक, अकेला, अनोखा या अपने किस्म का एकमात्र जैसा दूसरा कोई न हो (जैसे कि एको अहं द्वितीयो नास्ति), वाहिद ईश्वर का भी एक नाम है। आप इसमें से किसी भी कारण से मेरा तख़ल्लुस मान सकती हैं पर मेरा इसे चुनने का कारण है अनोखा। हाँ अगर ‘वाहिद’ ‘वाहिदः’ (जो उर्दू में छोटी हे के साथ लिखते हैं) के बीच में भ्रमित हैं तो दूसरे वाले का अर्थ होता है – एक इकाई अथवा यूनिट। मैं आशा करता हूँ कि आपकी शंका का समाधान हो गया होगा और अगर नहीं हुआ तो आप निस्संकोच मुझसे कभी भी जवाब तलब कर सकती हैं। प्रतिक्रिया और सराहना के लिए हार्दिक आभार, :-)

    sinsera के द्वारा
    February 26, 2012

    बुत खूब संदीप जी,दरअसल कुछ लोग “तनहा ” या अकेला को वाहिद समझते हैं जो एक हल्का सा शब्द है. मुझे भी यही लगता था की आप ने “बड़ी हे “वाला वाहिद यानि “अपनी तरह का अकेला “ही चुना होगा.बस आप से पूछना चाहती थी. “खुदा”को भी वाहिद कहते हैं, पर उसे खुद पर लागू मत करिए गा , कुफ्र होगा….

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 27, 2012

    शुक्रिया सरिता जी। दरअसल मुझे मेरे फ़्रेंड सर्कल में मेरी तरह सोचने वाले बहुत कम ही लोग मिले हैं उनमें भी जो मिले हैं उनसे केवल कुछ ही मुद्दों पर सहमति बन पाती है। वाहिद के पीछे यही राज़ है। रही बात खुदा की तो वो तो क़ुदरत की सल्तनत में बस एक ही है अब लोग उसे जो भी नाम दें। आपके और मेरे विचारों के बीच की अद्भुत समानता देख कर अत्यधिक हर्ष हो रहा है। आभार आपका,

nancy4vaye के द्वारा
February 25, 2012

नमस्ते प्रिय! मेरा नाम नैन्सी है, मैं अपनी प्रोफ़ाइल को देखा और अगर आप कर रहे हैं आप के साथ संपर्क में प्राप्त करना चाहते मुझ में भी दिलचस्पी तो कृपया मुझे एक संदेश जितनी जल्दी भेजें। (nancy_0×4@hotmail.com) नमस्ते नैन्सी ***************************** Hello Dear! My name is Nancy, I saw your profile and would like to get in touch with you If you’re interested in me too then please send me a message as quickly as possible. (nancy_0×4@hotmail.com) Greetings Nancy

surendr shukla bhramar5 के द्वारा
February 25, 2012

कुछ न कुछ दे जाएँगे हम ख़ाक़ हो कर भी तुझे जैसे पिस कर भी, हथेली, सुर्ख़ बनाए हिना;…..काश ऐसा ही हो सब सोचें तो आनंद और आये जिसको समझा सरपरस्त सर-ता-पा* ‘वाहिद’ यहाँ वो तमाशा देखता है, मेरी बस्ती को जला; वाहिद काशी वासी भाई काविले तारीफ़ हर पंक्ति लाजबाब पर ऊपर वाली पंक्ति के तो क्या कहने ..ज़माना ही ऐसा है किस पर हम विश्वास करें और किससे चलते मुंह फेरें ?? जिन्दगी अपना पता बता दे तो फिर ये सहेली पहेली कैसे रहे ? भ्रमर ५

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    प्रिय भ्रमर जी, राधे-राधे! इतने सुन्दर शब्दों में आपने प्रतिक्रिया दी है और वो भी मेरे अशआर के मायने समझाते हुए कि कोई जवाब देते नहीं बन रहा। आपका तहेदिल से शुक्रिया। आभार सहित,

Sumit के द्वारा
February 25, 2012

दिल दिया उसको ही मैंने, और जाँ भी नाम की मुझको लेकिन इतने पर भी कहता है वो बेवफ़ा;…………… एक एक शब्द दिल को छु लेने वाला…..बहुत सुंदर http://sumitnaithani23.jagranjunction.com/2012/02/18/हिंदुस्तान-vs-इंडिया/

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार सुमित जी| वक़्त मिलते ही आपके लेख पर दृष्टिपात करता हूँ|

आर.एन. शाही के द्वारा
February 25, 2012

वाहिद जी, कौन आपको जीत सकता है, और किससे आप हार सकते हैं ? रही तवज़्ज़ो की बात, तो वह तो खुद आपकी मोहताज़ है, आप उसके नहीं । कवि का भावुक मन फ़िर भी अलग-अलग समय में भिन्न-भिन्न प्रकार की उड़ानें भरता रहता है, कब किस दिशा को कुलांचें मार बैठे, समझ पाना आसान नहीं होता । मैं तो इस कविता से जुड़ी तस्वीर देख कर दंग हूँ । आपकी ‘थोड़ी सी बेवफ़ा’ तवीयत के बावज़ूद कहीं न कहीं ‘आपका दिल हमारे पास है’ । अपनी तस्वीर देखिये, और मेरे विश्वयुद्ध से जुड़े ताज़ा लेख के अन्तिम पैरा की संवेदनशील पंक्तियों पर ज़रा गौर फ़रमाइये । आपको ऐसा नहीं लगता कि जिस समय आप तस्वीर को तजवीज़ कर पेस्ट करने की तैयारी कर रहे होंगे, ठीक उसी समय मैं भी कहीं बैठा वो पंक्तियाँ लिख रहा होऊंगा ?

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    गुरुवर को सादर प्रणाम, जीत हार तो दुनिया की रीत है। मेरे पसंद का शेर आपने इस ग़ज़ल में से छांट कर पकड़ ही लिया इसीलिए तो आप गुरु हैं। बहरहाल, जहाँ तक बात वैचारिक मेल की है तो मैं इस पर पूर्णतः यक़ीन करता हूँ कि हमारे कर्मों पर विचारों की अतिशय प्रधानता होती है। मन जो चाहे वो करवा ले। वैसे आपकी जानकारी के लिए ये बता दूँ कि मुझे कोई नई पोस्ट करने के लिए अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती क्यूंकि ख़ाली वक़्त में मैं अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने लायक बना कर अपने जे जे अकाउंट में सेव कर लिया करता हूँ। और ये रचना नवंबर माह में ड्राफ़्ट में डाली गयी थी हां समय-समय पर इसमें संशोधन अवश्य करता रहा हूँ और हो सकता है कि जब मैं इस ग़ज़ल के लिए चित्र का चुनाव कर रहा होऊंगा तब आप के मन में आपके लेख के विचार भी उमड़ रहे होंगे। हालांकि तस्वीर भी पिछले वर्ष ही लगा दी थी और केवल उपयुक्त समय की प्रतीक्षा में था कि कब सही वक़्त आये और मैं इसे पोस्ट करूँ। अभी ड्राफ़्ट में २९ रचनाएँ अपनी सद्गति की प्रतीक्षा में टुकुर-टुकुर ताक रही हैं। शेष इस मानसिक शक्ति और इसकी करामात पर भी एक लेख प्रक्रिया में है जो पूर्ण होते ही यहाँ अवश्य पोस्ट होगा।  विनयावनत,

minujha के द्वारा
February 25, 2012

वाहिद जी आपकी रचनाओं के बारे में क्या कहा जाए,हर नई रचना पिछली से बीस ही होती है,इसी तरह लिखते रहें,ढेर सारी शुभकामनाएं

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    धन्यवाद मीनू जी आपकी शुभकामनाएँ सहर्ष स्वीकार हैं| साभार,

Sushil Kumar Rai के द्वारा
February 25, 2012

good one like always. I am wondering if you get your poems published in a book.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    देखो क्या होता है। भविष्य ने क्या छुपा रखा है ये तो कोई नहीं जानता। बहरहाल यहाँ आने और टिप्पणी करने के लिए शुक्रिया।

krishnashri के द्वारा
February 25, 2012

आदरणीय वाहिद जी , नमस्कार , रचना की प्रत्येक पंक्ति बहुत सुन्दर है, भावपूर्ण है किसी एक पंक्ति को उद्धृत करना रचना के साथ अन्याय होगा . बहुत बहुत बधाई .

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    आदरणीय कृष्ण श्री जी, नमस्कार, मुक्त कंठ से प्रशंसा एवं सराहना हेतु आपका हार्दिक आभारी हूँ।

Mahendra Kumar Arya के द्वारा
February 25, 2012

लाजवाब ग़ज़ल दोस्त। अब तुम्हारा लोहा मान गया।

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    हाँ भईया लोहा सिंह… अब मेरी हथौड़ी न बनवा लेना। हा.हा..हा..

राजेन्द्र भारद्वाज के द्वारा
February 25, 2012

दिव्या जी का कमेन्ट थोडा मोडिफाई करना चाहता हूँ….***** ५ स्टार ही बनते है, बाकी सब तो पाठकवृन्द कह ही रहा है…. शुभकामनाएं….

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    भईया, मेरे लिए आपका स्थान अलग है। आप तो हमेशा ही मेरे लिए 5 स्टार बने रहेंगे। इसी बात पर 5 स्टार होटल में… ;-)

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
February 25, 2012

बहुत सुन्दर गजल,वाहिद जी. बेसबब भटक रहा हूँ मैं तुझी को ढूँढता काश बता देती मुझे तू ज़िंदगी अपना पता बहुत खूब.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    राजीव जी नमस्कार, प्रतिक्रिया और प्रशंसा के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।

vinitashukla के द्वारा
February 25, 2012

‘देखा तुझको भी बहुत और शान शौकत भी तेरी अब दिखाना है जो मुझको , तू अपनी दोस्ती दिखा’ बहुत ही प्रभावी और भावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए बधाई .

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    आदरणीया विनीता जी, आपकी प्रोत्साहनयुक्त बधाई सहर्ष स्वीकार है। सादर,

nishamittal के द्वारा
February 25, 2012

बहुत सुंदर वाहिद जी,वास्तविकता तो ये है कि हमारे पास आपकी रचनाओं की प्रशंसा करने की क्षमता नहीं है.बस इतना ही कह सकती हूँ अति सुंदर

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    आदरणीया निशा जी, आपकी क्षमता कितनी व्यापक है यह मुझे भलीभांति ज्ञात है। आपका प्रोत्साहन सदैव ही जोश का संचार करता है।

alkargupta1 के द्वारा
February 25, 2012

वाहिद जी , सदैव की भाँति सुन्दर शब्दों व भावों में पिरोई उत्कृष्ट रचना

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    आदरणीया अलका जी, सराहना एवं प्रशंसा के लिए आपका हार्दिक आभार।

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 24, 2012

जिसको समझा सरपरस्त सर-ता-पा* ‘वाहिद’ यहाँ वो तमाशा देखता है, मेरी बस्ती को जला; वाहिद जी, saadar अभिवादन , बम लहरी पोस्ट आपने तो वापस ले ली, भोले का दिन खाली न जाये इस लिए ॐ नमः शिवाय मैंने पोस्ट की , आपकी प्रतीक्षा अभी तक है . समीक्षा की हैसियत नहीं है, बधाई.

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    आदरणीय कुशवाहा जी, बम लहरी अभी भी अपने स्थान पर विराजमान है आप जब चाहें दृष्टिपात कर सकते हैं। भागदौड़ और आपाधापी के बीच कई बार बहुत कुछ अच्छा छूट जाता है। वक़्त मिलते ही आपकी पोस्ट ज़रूर देखूंगा क्यूंकि आपसे और शशिभूषण जी से बहुत कुछ सीखने को मिलता है। आप स्वयं एक उच्च कोटि के रचनाकार हैं और अपनी हैसियत न होने की बात कह कर आपने अपनी महानता दर्शायी है। सादर,

Aakash Tiwaari के द्वारा
February 24, 2012

आदरणीय श्री वाहिद जी, सबसे पहले तो आपसे एक बात कहना चाहूँगा की…आपका नाम वाहिद+काशीवासी मुझे बहुत ज्यादा अपनी ओर आकर्षित करता है…आप एक उम्दा रचनाकार है हमारी इतनी हैसियत नहीं की आपकी लेखनी का विश्लेषण करें.हम तो बस इतना कह सकते है मुझे ये रचना बहुत अच्छी लगी.. आकाश तिवारी

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    प्रिय आकाश जी, मेरा तख़ल्लुस आपको पसंद है जानकर अच्छा लगा। ख़ुद को व्यर्थ में हतोत्साहित क्यूँ करते हैं आपने बहुत सी ऐसी ग़ज़लें हम सब के साथ साझा की हैं कि जिनका कोई जवाब नहीं। रचना आपको अच्छी लगी और आपने सराहा उसके लिए आपका शुक्रिया अदा करता हूँ।

February 24, 2012

अस्सलाम वाल्लेकुम जनाब! है मुक़द्दस प्यार का जज़्बा ये मेरा ऐ हबीब क्यूंकि इसमें है भरा सिर्फ़ो सिर्फ़ ज़िकर तेरा;…बहुत ही खुबसूरत पंक्तियाँ है, जनाब, बधाई हो! जनाब ४-५ रोज पहिले इ-मेल द्वारा कुछ, जानकारी चाही थी. वो अभी तक हमें प्राप्त नहीं हुई. यदि वो जानकारी हमें मिल जाती तो बड़ी कृपा होती……

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    वालेकूमत सलाम, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभारी हूँ। आपकी कोई मेल मुझे नहीं मिली। यदि हो सके तो आप पुनः मेल भेजें मैं यथासंभव आपका सहयोग करने के लिए तत्पर हूँ। धन्यवाद,

ANAND PRAVIN के द्वारा
February 24, 2012

हारा ख़ुद को पर तुझे मैं जीत ना सका हर लम्हा है अब तो देखो मेरी सांस सा रुका; वाहिद जी, सादर प्रणाम लम्हों को रोकना हर किसी के बस में नहीं होता आपने उसे रोक के रखा ये आपकी हस्ती है बहुत ही उम्दा रचना आप की प्रसिधी के अनुरूप बधाई दूँ या नमन करूँ ये सोच रहा हूँ धन्यवाद मुझे मार्गदर्शित करने के लिए विशेष धन्यवाद, मैंने अपनी गलती सुधार दी है आपका आभार

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    प्रिय आनंद जी, ये मंच और इससे जुड़े हम सभी ब्लॉगर्स एक परिवार की तरह हैं। मेरी कोई ख्याति नहीं है जो नाम है वो सिर्फ़ इसलिए क्यूंकि मैं आप सब के बीच हूँ आपसे जुड़ा हुआ हूँ। आप छोटे भाई जैसे हैं तो अगर कहीं कुछ कमी महसूस होगी तो आपको इंगित करना मेरा फ़र्ज़ है ताकि आप perfection के साथ अपनी कृतियों का प्रस्तुतीकरण कर सकें और हम उसका समुचित आनंद उठा सकें। आपके अंदर अपार संभावनाएं हैं निरंतर अभ्यास से वे और भी सहज किन्तु अधिक सुंदर रूप में निखरने लगेंगी। प्रतिक्रिया के आभारी हूँ।

jlsingh के द्वारा
February 24, 2012

कुछ न कुछ दे जाएँगे हम ख़ाक़ हो कर भी तुझे जैसे पिस कर भी, हथेली, सुर्ख़ बनाए हिना; आदरणीय वाहिद भाई, नमस्कार! आपका तो कोई जवाब नहीं! सभी पंक्तियाँ एक से बढ़कर एक हैं!

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    प्रिय जवाहिर भाई नमस्कार, कृपया ये आदरणीय के संबोधन से दूर रखें मुझे। प्रिय कह कर आत्मीय ही बनाये रखें मैं एक साधारण सा इंसान हूँ आप ही लोगों के बीच का। मुक्तकंठीय प्रशंसा के लिए हार्दिक आभारी हूँ।

shashibhushan1959 के द्वारा
February 24, 2012

आदरणीय वाहिद जी, सादर ! बेहद दिलकश रचना ! मैं तो बस इतना ही कहूंगा—- . “सूरज मिले, चाँद पा जायें ! इतनी ऊँचाई पर जायें !! बादल बन साहित्य गगन में, परचम अपना लहरायें !!”" . हार्दिक शुभकामना !!

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, आप जैसे वरिष्ठ, अनुभवी, सुलझे हुए स्वनामधन्य रचनाकार से प्रशंसा मिलना किसी पुरस्कार के कमतर नहीं आँका जा सकता। काव्यात्मक प्रतिक्रिया के माध्यम से सराहना हेतु आपका ऋणी हूँ।

Santosh Kumar के द्वारा
February 24, 2012

वाहिद भाई जी ,.सादर नमस्ते बहुत भाव भरी रचना …. दिल दिया उसको ही मैंने, और जाँ भी नाम की मुझको लेकिन इतने पर भी कहता है वो बेवफ़ा;… …..पंचतारा रचना के लिए हार्दिक बधाई .

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    प्रिय संतोष भाई नमस्कार, आप सब लोग मिल कर इतने सारे पांच स्टार दे रहे हैं कि लगता है आप सब के लिए एक एक पीस फाइव स्टार का प्रबंध भी करना पड़ेगा। सराहना के लिए शुक्रगुज़ार हूँ।

tosi के द्वारा
February 24, 2012

वाहिद जी बहुत बढ़िया !  बेसबब भटक रहा हूँ मैं तुझी को ढूँढता काश बता देती मुझे तू ज़िंदगी अपना पता; * देखा तुझको भी बहुत और शानो शौक़त भी तेरी अब दिखाना है जो मुझको, तू अपनी दोस्ती दिखा;… खूबसूरत पंक्तियाँ … बधाई लें

div81 के द्वारा
February 24, 2012

***** ५ स्टार तो बनते है

div81 के द्वारा
February 24, 2012

बड़ी जल्दी में प्रतिक्रिया दे रही हु इस लिए इस वक़्त बहुत खूब ही कह पाऊँगी शमअ़ जलती है घरों में, रास्ते हैं स्याह क्यूँ इन अंधेरे रास्तों में रौशन करो कोई दिया; * जिसको समझा सरपरस्त सर-ता-पा* ‘वाहिद’ यहाँ वो तमाशा देखता है, मेरी बस्ती को जला; बहुत पसंद आये हमेशा की तरह बहुत खूब ………………. बधाई

    वाहिद काशीवासी के द्वारा
    February 25, 2012

    शुक्रिया दिव्या जी, प्रतिक्रिया के लिए कोई जल्दबाज़ी न किया करें। जब वक़्त हो तो आराम से पढ़ कर सोच समझ कर ही अपनी टिप्पणी दिया करें। पुनश्चः शुक्रिया आपकी सराहना के लिए।


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