सांस्कृतिक आयाम

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वाहिद काशीवासी


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“वो तमाशा देखता है”

Posted On: 24 Feb, 2012  
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“तुम कहाँ चले गए?”

Posted On: 13 Feb, 2012  
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कविता में

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“दिल्ली नहीं अब दूर है!!”

Posted On: 26 Jan, 2012  
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“फ़सल ख़्वाब की”

Posted On: 15 Nov, 2011  
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“बड़ी तवील सी है ज़िंदगी”

Posted On: 29 Oct, 2011  
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“घर: एक कथात्मक यात्रा संस्मरण-2″

Posted On: 4 Oct, 2011  
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“घर: एक कथात्मक यात्रा संस्मरण-1″

Posted On: 29 Sep, 2011  
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Others social issues लोकल टिकेट में

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“गुमान”

Posted On: 7 Sep, 2011  
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“मेरा हिन्दुस्तान छोड़ दो!”

Posted On: 18 Aug, 2011  
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“लौट कर आना ही था…!!!”

Posted On: 7 Aug, 2011  
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आख़िरी मुलाक़ात!!!!

Posted On: 24 Mar, 2011  
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बम-बम लहरी:महाशिवरात्रि पर विशेष

Posted On: 2 Mar, 2011  
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बस कुछ ही दूर …..

Posted On: 7 Feb, 2011  
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माँ से अभिलाषा – वसंत पंचमी पर विशेष

Posted On: 7 Feb, 2011  
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बाबू जयशंकर प्रसाद की लेखनी से : गुण्डा

Posted On: 29 Jan, 2011  
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Others sports mail लोकल टिकेट में

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क्यूँ हो गया??

Posted On: 20 Dec, 2010  
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दुःखद घटना

Posted On: 8 Dec, 2010  
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Others न्यूज़ बर्थ पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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वाराणसी : एक अखिल भारतीय नगर

Posted On: 5 Dec, 2010  
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Others मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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गंगा : राष्ट्रीय नदी पर राष्ट्रीय शर्म

Posted On: 1 Dec, 2010  
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क्या सही क्या ग़लत

Posted On: 29 Nov, 2010  
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हमारी विरासत: एक बेहतर कल

Posted On: 26 Nov, 2010  
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My Introduction Friends!!

Posted On: 23 Nov, 2010  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

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अस्स्ल्लाम वल्लेकुम, जनाब! इस मंच पर क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है, कुछ समझ नहीं आ रहा हैं. यदि हमें लगता है कि जे जे द्वारा उचित सम्मान नहीं मिलता तो किसी के सम्मान की जरुरत ही क्या है, हम कलम के सिपाही है. हम अपनी बात रखने आये है न कि सम्मान पाने यदि हम जानते है कि हमारी बातें ९९ को अच्छी लगती है तो एक के अच्छे न लगने से कोई फर्क नहीं पड़ता. वाहिद जी यदि यह युद्ध यहाँ शुरू हुआ है तो ख़त्म भी इसी युद्धभूमि पर होगा और आप चाहकर भी इस मैदान से भाग नहीं सकते. यदि कोई गुरु किसी कारणवश युद्ध से मुंह मोड़ रहा है तो एक शिष्य का फ़र्ज़ बनता है कि उस युद्ध को जीतकर साबित करें कि उसका गुरु सही है..... आप एक योद्धा हो........और एक योद्धा गुरु के सम्मान के लिए हथियार डालता नहीं है बल्कि उठाता है......याद रहें... यह वही महाभारत के अनमोल क्षण है....जहाँ एक तरफ कौड्वों कि सेना है और दूसरी तरफ पांडवों की. बस परिवेश बदल गया है और साथ ही लड़ने का ढंग भी. इस मंच रूपी कुरुक्षेत्र में विजय पताका फहरा कर, आप सिद्ध करों कि आप ही अर्जुन हो......यही आपके गुरु के लिए सही सम्मान होगा.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

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के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

सरिता जी नमस्ते! तस्वीर की बाबत यही कहूँगा कि बहुत देर तक सैकड़ों तस्वीरों को तलाशने के बाद मुझे यही तस्वीर बिलकुल मौज़ूँ लग रही थी। सामान्यतः मैं अपनी बनायी तस्वीरें लगाना ही पसंद करता हूँ पर समयाभाव के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाता। आपके कथन से आपकी उच्च विचारों का पता चलता है साथ ही यह भी कहूँगा कि आपका सामान्य ज्ञान बहुत ही उन्नत है। अब बात भाषा की - जैसा कि हर भाषा में होता है कि एक ही शब्द के मायने अलग-अलग जगह और अलग-अलग परिस्थिति में बदल जाते हैं वैसा ही कुछ मेरे तख़ल्लुस के साथ भी है मैं आपको 'वाहिद' के जितने भी अर्थ जानता हूँ बता देता हूँ और मेरा ये तख़ल्लुस चुनने के पीछे क्या वजह थी ये भी बता देता हूँ। वाहिद का अर्थ होता है - एक, यक, अकेला, अनोखा या अपने किस्म का एकमात्र जैसा दूसरा कोई न हो (जैसे कि एको अहं द्वितीयो नास्ति), वाहिद ईश्वर का भी एक नाम है। आप इसमें से किसी भी कारण से मेरा तख़ल्लुस मान सकती हैं पर मेरा इसे चुनने का कारण है अनोखा। हाँ अगर 'वाहिद' 'वाहिदः' (जो उर्दू में छोटी हे के साथ लिखते हैं) के बीच में भ्रमित हैं तो दूसरे वाले का अर्थ होता है - एक इकाई अथवा यूनिट। मैं आशा करता हूँ कि आपकी शंका का समाधान हो गया होगा और अगर नहीं हुआ तो आप निस्संकोच मुझसे कभी भी जवाब तलब कर सकती हैं। प्रतिक्रिया और सराहना के लिए हार्दिक आभार, :-)

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

गुरुवर को सादर प्रणाम, जीत हार तो दुनिया की रीत है। मेरे पसंद का शेर आपने इस ग़ज़ल में से छांट कर पकड़ ही लिया इसीलिए तो आप गुरु हैं। बहरहाल, जहाँ तक बात वैचारिक मेल की है तो मैं इस पर पूर्णतः यक़ीन करता हूँ कि हमारे कर्मों पर विचारों की अतिशय प्रधानता होती है। मन जो चाहे वो करवा ले। वैसे आपकी जानकारी के लिए ये बता दूँ कि मुझे कोई नई पोस्ट करने के लिए अधिक मेहनत नहीं करनी पड़ती क्यूंकि ख़ाली वक़्त में मैं अपनी रचनाओं को प्रकाशित करने लायक बना कर अपने जे जे अकाउंट में सेव कर लिया करता हूँ। और ये रचना नवंबर माह में ड्राफ़्ट में डाली गयी थी हां समय-समय पर इसमें संशोधन अवश्य करता रहा हूँ और हो सकता है कि जब मैं इस ग़ज़ल के लिए चित्र का चुनाव कर रहा होऊंगा तब आप के मन में आपके लेख के विचार भी उमड़ रहे होंगे। हालांकि तस्वीर भी पिछले वर्ष ही लगा दी थी और केवल उपयुक्त समय की प्रतीक्षा में था कि कब सही वक़्त आये और मैं इसे पोस्ट करूँ। अभी ड्राफ़्ट में २९ रचनाएँ अपनी सद्गति की प्रतीक्षा में टुकुर-टुकुर ताक रही हैं। शेष इस मानसिक शक्ति और इसकी करामात पर भी एक लेख प्रक्रिया में है जो पूर्ण होते ही यहाँ अवश्य पोस्ट होगा।  विनयावनत,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

वाहिद जी, कौन आपको जीत सकता है, और किससे आप हार सकते हैं ? रही तवज़्ज़ो की बात, तो वह तो खुद आपकी मोहताज़ है, आप उसके नहीं । कवि का भावुक मन फ़िर भी अलग-अलग समय में भिन्न-भिन्न प्रकार की उड़ानें भरता रहता है, कब किस दिशा को कुलांचें मार बैठे, समझ पाना आसान नहीं होता । मैं तो इस कविता से जुड़ी तस्वीर देख कर दंग हूँ । आपकी 'थोड़ी सी बेवफ़ा' तवीयत के बावज़ूद कहीं न कहीं 'आपका दिल हमारे पास है' । अपनी तस्वीर देखिये, और मेरे विश्वयुद्ध से जुड़े ताज़ा लेख के अन्तिम पैरा की संवेदनशील पंक्तियों पर ज़रा गौर फ़रमाइये । आपको ऐसा नहीं लगता कि जिस समय आप तस्वीर को तजवीज़ कर पेस्ट करने की तैयारी कर रहे होंगे, ठीक उसी समय मैं भी कहीं बैठा वो पंक्तियाँ लिख रहा होऊंगा ?

के द्वारा:

प्रिय वाहिद भाई ..... सप्रेम आदाब अर्ज है ! जय हो भोले शिव शंकर की जय हो त्रिपुरारी उमापति जी की आपके इस लेख को देख कर पुरानी यादे ताजा हो उठी ..... कल को शिवरात्री है तो जाहिर सी बात है की प्रसाद बंटेगा भी और आप उसको ग्रहण भी करोगे ..... भांग की मस्ती भरी तरंगों में झूलते हुए इस बार भी दो पंक्तिया इस भक्तिमयी रचना में जुड़ जाए तो क्या बात हो ! जय हो नटराज त्रिपुरारी + कंसारी + वरमालाधारी जी की जय हो जयमाला + बनमाला + मुण्डमाला धारी जी की :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

नमस्ते संतोष भाई, बनारस है ही ऐसा कि न तो ये खुद और न ही अपने किसी अनुभव को भूलने देता है। जिस भी चीज़ के साथ 'बनारसी' विशेषण लगा वो स्वतः ही विशिष्ट हो जाती है। कृपया रामेश्वरम की तस्वीरें फ़ेसबुक पर साझा करें और हो सके तो ब्लॉग रूप में यात्रा के संस्मरण भी प्रस्तुत करें। आपके लिए लेमन चाय जिसे यहाँ 'लिकर' कहते हैं की रेसिपी यहीं प्रस्तुत है - गिलास या कप में चीनी डाल लें, आधे निम्बू का रस निचोड़ लें, बाज़ार में उपलब्ध हाज़मोला के एक रुपये के पाउच को बिना खोले कूट लें और गिलास में आधी मात्रा डालें, आधी-आधी चुटकी पिसा भुना ज़ीरा और काला नमक डालें फिर साफ़ छन्नी में आवश्यकतानुसार चायपत्ती डाल कर ऊपर से धीरे-धीरे गर्म पानी डालते जाएँ। चम्मच से मिला कर गर्मागर्म सर्व करें। आनंद उठाइये 'लिकर' चाय का। :-)

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

प्रिय राजकमल भाई नमस्कारम्! दो की जगह आप चार बातें भी कहते तो मुझे बुरा नहीं लगता क्यूंकि आप ही की तरह ये पिछले जन्म वाले संस्कार मुझ में भी मौजूद हैं। अब कुछ बातें मैं भी बता दूँ आपको - पहली कि इस नज़्म में मेरे अलावा किसी का भी योगदान कहीं से भी नहीं है इसके बोल, धुन और आवाज़ सभी शत प्रतिशत ख़ालिस मेरे हैं क्यूंकि मैं पाइरेसी में यक़ीन नहीं रखता। दूसरे - जितनी नज़्म आपको लिखी हुई दिख रही है उतनी मैंने गाई भी है शायद आपने ध्यान से सुनी नहीं या फिर उसे सुनते समय उसी में डूब गए। आपका खुद का मतलब भी मेरे लिए मेरे मतलब जैसा ही है आपकी मेल की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। आपकी ढेर सारी प्यारी बातों के लिए ढेर सारा शुक्रिया,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

प्रिय वाहिद भाईजान ..... आदाब ! कभी अपने दिल में झाँक कर तो देखा होता ऐ मेरे हमदम हम वहीँ थे, लेकिन तुम ढूंडते रहे हमे वहां, जहाँ पर हम नहीं थे" टाटा फोटोन प्लस का असली फायदा आज उठाया जब उसने आपका यह क्लिप झट से डाउनलोड कर दिखाया अगर बुरा ना माने तो दो बाते कहनी चाहूँगा (क्योंकि कुत्ती चीज हूँ ) *ऐसा लगा की जैसे आपने पहले अपनी इस नज्म को किसी गीतकार से गंवाया फिर उसी की धुन पर आपने हुबहू इसको वैसा ही गाया ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ की क्योंकि महसूस हो रहा था की एक गीतकार इस गीत को तरन्नुम में बिना भटके और अटके गा रहा है..... *आखिर में आपने "तुम दिल में उतर गए" नहीं गाया क्यों यह तो आप ही जानते होंगे इस बार खाली मुबारकबाद नहीं दूँगा एक मेल भेझुंगा अपने खुद के मतलब के लिए हा हा हा हा हा हा हा हा हा

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आदरणीय शशिभूषण जी, सादर प्रणाम, आपकी उपमाएं पढ़ कर फूला नहीं समा रहा। पिछले वर्ष जे जे द्वारा आयोजित वैलेंटाइन कॉन्टेस्ट के दरमियाँ इस तरह की पोस्ट करने का विचार मन में आया था। तब ऐसी दो संगीतमय पोस्ट की थीं। इस वर्ष पुनः वही मौसम आया तो सोचा कि क्यूँ न कुछ ऐसा ही करूँ। ऐसे ही अनेक धुनरचित गीत मेरे पास मौजूद हैं जिन्हें अल्बम की श़क्ल देने की तमन्ना काफ़ी वक़्त से दिल में पाले हुए हूँ शायद कभी ऐसा मौक़ा आ ही जाए। आपके स्नेह एवं सम्मान से ज्ञात होता है कि आप और आपके विचार कितने उदात्त और महान हैं। आपके प्रोत्साहन एवं प्रशंसा दोनों के लिए आभार जैसा शब्द भी कम प्रतीत हो रहा है। सादर,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

वाहिद भाई, नमस्ते आपकी कविताओं की कशिश ने मार डाला आपने बहुत अच्छा की की अपने अपनी आवाज़ को भी हमारे बिच प्रस्तुत किया इससे दो बाते हुई की आपकी लिखी कविताओं का मूल भाव हम जान सकें क्यूंकि ज्यादातर कविताओं के साथ ये होता है की कवी अपनी किसी ख़ास सोच के साथ लिखता है और पढने वाले लोग उसे कुछ और तरीकों से पढ़ते है जिसे उस कविते का मूल भाव मिट जाता है दूसरी बात की जितनी सुन्दर और भावनात्मक आपकी कवितायें होती है उतनी ही कर्णप्रिय आपकी आवाज़ भी है जिसे सुन कर निर्मल आनंद मिला बस यह भी बता देते की किनके जाने का ये दर्द निकल आया है, १२ और १४ के बिच में आया आपका ये नगमा कुछ और इशारे कर रहा है............हा हा हा

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

प्रिय वाहिद भाई ..... सप्रेम नमस्कारम ! मुल्क की आज़ादी पे जो, ख़्वाब देखा था हसीं, हाकिम ने रौंदा इस तरह, टूटाओ चकनाचूर है; यह “अधूरे ख्वाब” भारत की जनता का ही नहीं बल्कि हमारे बाप दादाओ के भी है .... इसलिए उन महान आत्माओं + पूर्वजो की संतान होने के कार्न यह हमारा ना केवल फर्ज है बल्कि नैतिक रूप से भी कर्तव्य बन जाता है की हम उनके सपनो को पूरा करे ...... वंदे मातरम हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा सरस्वती माता जी के पूजन की हार्दिक मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

प्रिय अनुज बैजनाथ जी आपको भी नमस्कार! मुझे भी अपनी इस ग़ज़ल में मक़्ता ही सबसे ज़्यादा पसंद है। अदबी उर्दू में बहुत दिनों से कुछ करना चाह रहा था जिसके अंजाम में ये ग़ज़ल बन पड़ी। बहुत दिनों से आप ऑनलाइन नहीं दिखाई दिए तो मुझे भी कुछ शंका हो रही थी हालाँकि मेरा सोचना था कि आप शायद किन्हीं पेशेवर उलझनों में व्यस्त रहे होंगे। खैर आपका स्वास्थ्य अब तो ठीक है न? गाँव जाकर स्वास्थ्यलाभ (मानसिक व शारीरिक दोनों ही) किया होगा आपने। आपका सलाम हमेशा ही बेहतर करने का जज़्बा जगाता है। यात्रा वृत्तान्त के दोनों भागों और मेरा हिंदुस्तान छोड़ दो की मुक्त कंठ से सराहना के लिए आपका हार्दिक आभारी हूँ।

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

पीयूष भाई नमस्कार, आपके पास समय की कमी रहती है इस तथ्य से मैं भलीभांति परिचित हूँ। मेरे दृष्टिकोण से प्रतिक्रिया से केवल एक फ़र्क़ पड़ता है कि - अपनी ख़ुबियों और ख़ामियों दोनों को ही जानने का अवसर प्राप्त होता है। कोई यूँ ही तारीफ़ कर के चला जाए तो अच्छा तो लगता है मगर जब कोई उसमें से कोई कमी ढूंढ निकालता है तो और भी अच्छा लगता है कि किसी ने इतने ध्यान से मेरी रचना पर दृष्टिपात किया और उसकी त्रुटियों की ओर इंगित भी किया। दूसरे जब कोई रचना के मर्म या सार को पकड़ लेता है तो भी प्रसन्नता होती है।  आप स्वयं ही एक प्रबुद्ध रचनाकार हैं और इसका प्रमाण कोई इंसान नहीं आपकी रचनाएँ स्वतः ही हैं। धन्यवाद आपका प्रोत्साहन के लिए।

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani Piyush Pant, Haldwani

मेरे प्यारे भाई ,,बहुआयामी गजल है इसका हर एक शेर एक नई और अलग कहानी ब्यान कर रहा है ( न हो सका ख़ुशी में शामिल तो मलाल नहीं ,शुक्र है ग़म तो किसी का मैं यहाँ बाँट सका;) काश यह जज्बात हर हिन्दोस्तानी के दिल में हो लेकिन अफ़सोस न जाएं क्यों लोग द्विआयामी जीवन शैली अपनाते हैं ---(बड़ी तवील सी है ज़िंदगी जो ख़त्म ना हो तन्हाईयों का ये वक़्त न मैं काट सका;) अनुराधा पौडवाल एक एक गजल गाई थी शायद तुम्हे याद हो (जिन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं ,, मै तो मर कर भी मेरी जान तुम्हे चाहूंगी ) यहाँ जिन्दगी बहुत ही छोटी जान पडती है लेकिन उक्त शब्दों के मायने अलग अलग लोगों के लिए अलग अलग हो सकते haen - yaar aaj bhut kuchh likhne kaa man thaa but Translator is not working :) so fir kbhee-- jay bharat

के द्वारा:

प्रिय राजकमल भाई, आपने जो शेर कहा वो तो बहुत ही बेहतरीन है। आपने औपचारिकता से भी स्वयं को बचा लिया ये सचमुच बड़ी बात है (मैंने तो आपके जुबली जी से मज़ाक-२ में ही कहा था)। अब अगर आपको अपने सपनों में पिछले कुछ दिनों से उनकी जुड़वाँ रचनाएँ दिख रही हैं तो इसका कारण शायद आपका उनके प्रति असीम मित्रवत स्नेह ही है। शेष अगर आप वाकई उनसे कुछ कहना चाहते हैं तो आपको कोई रोक नहीं सकता। आप उनसे जब भी चाहें उनसे ९४१२०५९८५९ पर संपर्क कर सकते हैं ( उन्होंने आपको पहले भी यह संपर्क सूत्र दिया है) आपको भी पर्वोत्सव की अनेकानेक हार्दिक शुभकामनाएँ एवं हमारी अभिलाषाएं(आपकी सफलता एवं उन्नति हेतु)। और अंततः आपका हार्दिक आभार ;)  

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

भईया को सादर प्रणाम, अंततः मैं आपको खींच ही लाया। ज़िंदगी की क्या कहें कुछ ऐसा ही हाल इधर भी है, जो मुझे समझता रहा उसे पहचान नहीं पाया और जिसे समझाने की कोशिशों में लगा रहा वो इससे इंकार ही करता रहा। एक दिन यूँ ही बैठे-ठाले दिमाग़ी घोड़े बेकाबू हो उठे तो मैंने भी उन्हें स्वछन्द विचरण के लिए छोड़ दिया और जब वे लौट कर आये तो ये ग़ज़ल मेरी लेखन पुस्तिका में दर्ज हो चुकी थी। शुक्रिया आपका इस ५/५ के लिए (वैसे बात आपकी हो तो ये सब उतना मायने नहीं रखता क्यूंकि आप मेरे लिए कैसी सोच रखते वो केवल मैं ही जान सकता हूँ) ओह..औपचारिकता तो मंच की परम्परा है तो इसे निभा दूँ.. प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार आपका ;)

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नमस्कार संतोष भाई, रचनाकार तो हूँ पर श्रेष्ठता इत्यादि का फ़ैसला तो आप ही लोगों को करना होता है। अपने बड़े भाई की देखादेखी लिखने का शौक़ कक्षा ६ में अध्ययन के दौरान ही चर्रा गया था और माँ वाग्देवी की असीम अनुकम्पा ने मुझ तुच्छ जीव को भी आप लोगों के स्नेह का पात्र बना दिया। कवि का हृदय संवेदनशील होना नितांत अनिवार्य है अन्यथा वो एक तुकबाज़ से ज़्यादा कुछ नहीं हो सकता। जो कुछ भी इस जीवनकाल में देखा और महसूस किया वो अपनेआप ही शब्दरूप में काग़ज़ पर उतर आया। किसी गद्य रचना के भावों को समझ लेने से बड़ी प्रशंसा कुछ हो ही नहीं सकती और आप इस कसौटी पर सर्वथा खरे उतरे हैं। और रही ख़ुद्दारी की बात तो मेरी अंतरात्मा में कुछ इस क़दर रची बसी है कि चाह कर भी उसे अलग नहीं कर सकता। और जब विपरीत परिस्थितियों में भी ये हौसला टूट नहीं पाया तो अनुकूलता के समय में इसे भूलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

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यही तो आपकी महानता है गुरुवर कि मुझ जैसे तुच्छ प्राणी के विचारों में भी आप साहित्यिक छटा का आभास कर लेते हैं। मैं तो कैसी भी साधना नहीं कर पाया चाहे वो कला हो साहित्य हो अथवा संगीत। आज तक बस जो भी मिलता गया अगर वो अच्छा लगा तो आत्मसात कर लिया और बुरा लगा तो भी उसे छिटकाया तो नहीं हाँ, भविष्य की अथाहता और अनिश्चितता के चलते किसी कोने में बांध कर फेंक दिया कि क्या पता ख़ुदा न ख़ास्ता कभी किसी उस तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़ जाए तो मेरे तूणीर में भी कुछ बाण शेष रहें।  आपकी प्रशंसा के प्रत्युत्तर हेतु मेरी शब्दों की संकुचित पोटली ख़ाली नज़र आ रही है। फिर भी चरणस्पर्श करके आशीर्वाद तो प्राप्त कर ही लूँगा (हक़ के साथ)।

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

प्रिय वाहिद भाई, सादर वंदे मातरम| यह महज एक शाब्दिक विश्लेषण नहीं..दीपावली का तात्विक विश्लेषण है|आपने जिन अर्थों में दीपावली को समझा है ..वही दीपावली का वास्तविक अर्थ है...पहले असतो मा सद्गमय , फिर तमसो मा ज्योतिर्गमय और सबसे अंत में मृत्योर मामृतम् गमय|असत मिटे..तमस हटे फिर मृत्यु की क्या हिम्मत? यही आर्ष दर्शन है ...यही वेद है और यही मनुष्य का परम धर्म|मनुर्भव...मानव बनो|देवता नहीं...दानव नहीं सिर्फ मानव| धनत्रयोदशी की हार्दिक शुभकामनाएं| आयल धनतेरस हौ लेकिन.. ३२ रुपिया में का होई? महंगाई क भाव चढल बा| देश में जइसे आग लगल बा| एक गो चम्मच १२ रुपिया.. ३ में लेवय कर्जा होई| आयल धनतेरस हौ लेकिन.. ३२ रुपिया में का होई?.......... जय भारत ..जय भारती| जय भारत, जय भारती|

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

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प्रिय भ्राता श्री,  आप जानते हैं मैं किसी भी असर में नहीं आता, कम से कम इस मंच पर तो नहीं। क्यूंकि मैं मौलिक रचनाएँ प्रस्तुत करने में ही विश्वास रखता हूँ। खैर आपने चातक जी जैसे "हॉल ऑफ़ फ़ेम" ब्लॉगर से मेरी पोस्ट को प्रेरित अथवा प्रभावित बताया शायद इसी बहाने मैं भी हिट हो जाऊं। यह पोस्ट मैंने लगभग दो साल पहले तैयार की थी जिसे कि मैंने कई वर्षों पूर्व ही एक लेख से प्रभावित हो कर लिखा था। आपको (और आपके परिवार को ) भी दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ। सच कहूँ तो मैं इंतज़ार करता रह गया पर सुबह की पोस्ट रात तक फ़ीचर्ड नहीं हो सकी किन्तु अनेक पोस्ट्स जो मेरे काफ़ी बाद में आयीं वे हो गईं। अब केवल प्रतीक्षा ही शेष है अन्यथा कल तो रविवार है ही। :) :( ;) :O 8) :|

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

प्रिय वाहिद भाई .....आदाब ! जागरण ने दीपावली पर बहुत सारी उपयोगी पोस्ट की है लेकिन हम लोगों द्वारा बहुत कम पोस्ट की गई है ..... मैं भी शायद नेट की समस्या के कारण तैयार पोस्ट को न भेज सकूं ..... ऐसे बेरोनक मौसम +त्यौहार में आपकी इस पोस्ट ने जगमगाहट और अनेको रंग भर दिए है ..... आप पर भी अब शायद चातक जी का असर हो रहा है उसी स्टाइल की पोस्ट लेकिन भाषा शैली आपकी दोनों पिछली पोस्ट जैसी अति उत्तम ...... यह रास्ता आपको एक दिन नई ऊँचाईयों की तरफ ले जाएगा ..... मेरी अग्रिम शुभकामनाये और मुबारकबाद दीपावली की सपरिवार बधाईयां और मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

आपकी तारीफ़ पा कर हमेशा ही अच्छा लगता है प्रिया जी। मैं भी अपने गुमान की इन दुआओं में से किसी एक के ही आमीन हो जाने को दुआ कर रहा हूँ। यदि विचार मिल जाते हैं तो अवसर तो स्वतः ही उपलब्ध हो जाते हैं। आपके ई-मेल एड्रेस के माध्यम से आपको ढूँढा फ़ेसबुक पर।  :) चूंके आप सदैव ही मेरी चुनिन्दा रचनाओं को प्रोत्साहन देती हैं जिन्हें मैं खुद भी ख़ास समझता हूँ अतः आपको ढूंढते-ढूंढते फ़ेसबुक ही एक सहारा मिला। और आप निश्चिन्त रहें मैं अपने अधूरे कलाम भी फ़ेसबुक पर डाल देता हूँ ताके आप सब की त्वरित प्रतिक्रियाओं के माध्यम से सुधार की पूरी गुंजाइश बनी रहे इससे पहले कि मैं अपनी रचना यहाँ प्रकाशित करूँ। आभार आपका,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

राजकमल भाई को सादर नमस्कार, आपने सही अर्थ समझे थे ये मैं तब भी जानता था। भारतवासी सारी दुनिया में सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं और कामयाबी का परचम लहरा रहे हैं उसके विपरीत अपने ही देश में हमें अपने लिए एक अदद शासक नहीं मिल रहा है और उसे इटली से आयात करना पड़ रहा है। जितने नामों का उल्लेख आपने किया है उसके अलावा अनेक ऐसे हिन्दुस्तानी नाम है जो हमारे सर को ऊंचा करने में कोर कसर नहीं छोड़ रहे और एक हम है कि...। वैसे एक बात कहूँगा कि विदेशों में भारतीयों ने जो उच्च स्थान प्राप्त किये हैं उनके पीछे चाटुकारिता इत्यादि नहीं बल्कि उनकी योग्यता ही मुख्य कारक है जबकि हमारे देश में एक खानदान की पाबोसी में लगे लोग सारी नैतिकता ताक पर धर चुके हैं।आशा है आप भी मेरा तात्पर्य ग्रहण कर लिए होंगे। साभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

प्रिय वाहिद भाई ..... आदाब ! अपने किये हुए वायदे के अनुसार हाजिर हूँ ..... अब लग रहा है की जो अर्थ हमने समझे थे वोह आप वाले से कुछ ज्यादा अलग तो नहीं थे .... ************************************************************************************************************** हमारे देश के एक नागरिक श्री महिंद्र चोधरी को कुछेक संकीर्ण लोगों के कारण फिजी के प्रधानमंत्री पद से हाथ धोना पड़ा इसका मुझको पूरी जिंदगी दुःख रहेगा ..... आज के अखबार में पढ़ा की एक भारतीय पहली बार ( जर्मन में पहली बार किसी विदेशी ) वहां के शाही सदस्य के खाली हुए स्थान पर काबिज होगा ..... इंग्लैण्ड में लार्ड स्वराज्पाल और अमेरिका में बाबी जिंदल ने हमारे देश का सर ऊँचा किया है ..... आगे आप खुद समझदार है .....

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

समझता था मुक़र्रब मैं जिन्हें उनका है ये सिला, न दे सके कभी शफ़क़त मसाइब है मुझे मिला; == जिसे मैं अब तक दोस्त समझता था ये उसने मेरे विश्वास का ये प्रतिफल दिया है, कभी मुझसे स्नेह तो जताया नहीं उलटे मेरी मुश्किलें ही बढ़ाता रहा - ये आज के परिप्रेक्ष्य में एक आदमी का दूसरे आदमी पर से उठते विश्वास को दर्शा रहा है। -------- बड़ा था फ़ख़्र हममें है रविश दुनिया बदलने की, लगाया ज़ोर जब हमने कोई संगरेज़ ना हिला; == हम सभी अपनेआप को इतना सक्षम समझते हैं और डींगे हांकते रहते हैं कि जो होगा देख लेंगे या फिर जो हम चाहते हैं वही होगा, मगर जब यथार्थ का सामना करना पड़ता है तब हमें अपनी क्षुद्रता का अपनी लघुता का एहसास होता है। कुछ कर गुज़रने की कोशिश में जब हम पूरी तरह से विफल हो जाते हैं तब हम इस बात को मानते हैं। -------- ये उनके रम्ज़े चश्म मायने रखते हैं अनगिनत, जिसे समझा था उल्फ़त का वो एतिकाफ़ का निकला;== सामान्य अर्थों में ये शेर एक प्रेमी की अभिव्यक्ति है जो अपनी प्रेमिका की आँखों के इशारों को समझने में भूल कर देता है मगर यहाँ पर इसका उपयोग मैंने प्रतीकात्मक रूप में एक आम नागरिक और शासन के लिए किया है। आम आदमी प्रेमी है और शासन प्रेमिका। प्रेमी बार बार अपनी प्रेमिका के बहकावे में आ जाता है कि वो उस पर सबकुछ निछावर करना चाहती है मगर अंत में प्रेमी को समझ में आता है कि वो स्वयं ही लुट चुका है। यही हालत आज हम सबकी है। -------- तरश्शुह उनके ख़्वाबों का भिगो देता तो बच जाता, मुअम्मल हो गया पर अब्र वो दिल बरसों तलक जला;== ग़ज़ल के नियमों का ख़याल करते हुए, यानी के उसमें मौज़ूँ एक नहीं हो सकता, इस शेर को यहाँ डाल दिया है। कि अगर वो सपनों में भी आ जाते तो दिल को कितनी बेतरह ख़ुशी होती मगर ऐसा भी नहीं हो सका और महबूब अपनी महबूबा के वास्तविकता में तो दीदार नहीं ही कर पाता पर सपनों में भी वो नहीं आती। वैसे मुल्क के हालात को देखते हुए हम इसे भी सामान्य रूप से इस्तेमाल कर सकते हैं। -------- मेरी ख़फ़गी की वजह है बहुत ही मामूली ‘वाहिद‘ ये बेरूनमुल्क मुन्तज़िम ओ उनकी पाबोसी का ये अमला;== इस शेर में शाइर अपने मुल्क के लोगों से भी ख़फ़ा है और उसकी एक ही वजह है कि सवा अरब आबादी में क्या कोई भी इस लायक नहीं था कि उसे सत्तासीन किया जा सके, और उसकी जगह हमें के पश्चिमी देश से अपने शासक का आयात करना पड़ा है और उस पर तुर्रा यह देखिये कि शासन से जुड़े अन्य लोगों के लिए उस विदेशी शासक के अलफ़ाज़ पत्थर की लकीर की तरह हैं और वे दिन रात उसकी चाटुकारिता और उसके तलवे चाटने में लगे रहते हैं। -------- हर चेहरे पे एक अफ़सुर्दगी सी आज चाहे हो, लगे रहो रियाज़त में तो टल जाएगी बला;== इस शेर में शाइर ये कल्पना कर रहा है कि आज चाहे हालात बद से बदतर हों मगर यदि हम अपने कर्म में पूरी श्रद्धा से लगे रहें तो कल को सबकुछ बदल कर एक बेहतर स्थिति बन सकती है। ----- प्रिय ब्लॉगर बंधु-बांधवों, मुझे आशा ही नहीं विश्वास है कि अब आप सभी के सामने इस ग़ज़ल के भाव स्पष्ट हो गए होंगे। सामान्यतः ये भाव शाइर अपने श्रोताओं अथवा पाठकों के विवेक पर ही छोड़ देता है पर आप सभी के कहने को टालना मुझे उचित नहीं लग रहा था अतएव मुश्किल अशआर के मायने मैंने यहाँ पर आपके लिए पेश कर दिए हैं।  आप सभी को हार्दिक धन्यवाद सहित,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

आप सभी की प्रतिक्रियाओं को देखते हुए शीघ्र ही सारे अशआर को भावार्थ के साथ प्रस्तुत करूँगा और तभी आप सब की प्रतिक्रियाओं के जवाब भी दूंगा। फ़िलहाल यही कहना चाहूँगा कि उर्दू हिंदी की छोटी बहन है और हमारी रोज़मर्रा की बोलचाल में लगभग ७० फ़ीसदी शब्द उर्दू के ही होते हैं। चूंकि मैंने अथक परिश्रम के बाद उर्दू पर कुछ हद तक अधिकार प्राप्त किया है और काफ़ी दिनों से इसका अभ्यास न हो पाने के कारण उस भाषाई अधिकार को क्षति पहुँचने की सम्भावना बलवती हो रही थी अतः सोचा कि क्यूँ न आप सब प्रबुद्ध जनों के बीच साहित्यिक उर्दू की एक रचना की बानगी पेश करूँ। आशा है मेरे भावार्थ प्रकाशन के बाद आप सभी संतुष्ट होंगे व साथ ही साथ आप सभी के उर्दू के कोष में भी समुचित बढ़ोत्तरी होगी। धन्यवाद।

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

आदरणीय वाहिद जी ,.सादर नमस्कार बहुत उम्दा कालजयी रचना जिसको समझने के लिए मुझ मूरख दिमाग को कापी पेन तक का इस्तेमाल करना पड़ गया ,..... .............................. मेरी ख़फ़गी की वजह है बहुत ही मामूली ‘वाहिद‘ ये बेरूनमुल्क मुन्तज़िम ओ उनकी पाबोसी का ये अमला; हर चेहरे पे एक अफ़सुर्दगी सी आज चाहे हो, लगे रहो रियाज़त में तो टल जाएगी बला;"........ एक देशप्रेमी के जज्बात ,दर्द ,आक्रोश और लाचारगी सब छलक आये ,...सन्देश कुछ अस्पष्ट सा ...वैसे आजकल स्पष्ट तो कुछ होता ही नहीं ,..सबसे निचले पायदान पर बैठे हम कहाँ समझ पा रहे हैं ,.हुक्मरानों/.गुलामों की चालों को ..... मुझे शिकायत है आपसे ,..इसमें इतनी गाढ़ी उर्दू क्यों इस्तेमाल की ?.....बहुत आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

१३ दिनों में ३३०० किलोमीटर की इस यात्रा ने मेरे मन में बहुत ही गहन कलाकृतियाँ उकेरी हैं जिनका क्षरण इस प्रिय काशी वासी जी आप की ये प्यारी बातें मन की कामना सुन बहुत सुन्दर लगा संवेदनाएं मन में घर कर ली हम भी ऐसे ही देश भर में विचरते रहते हैं और कभी कभी कुछ लोगों के बीच बिताया गया एक पल भी यादगार हो जाता है और मन वाही सुरम्य वादियों में खो जाता है ..बहुत सुन्दर रही आप के साथ यात्रा और हिमालय की वादियों का दर्शन ..आप के सारे सपने साकार हों ..लेकिन आदमी कहाँ कहाँ बस जाए ? भ्रमर ५ जीवन में तो संभव कदापि नहीं दिखता| अपनी वापसी यात्रा से लेकर अभी तक मेरे अंदर वही ममत्व भरे शब्द गूंजते रहते हैं, ” यहीं रह जा तू, घर बना ले|” शायद ये मेरा स्वार्थ ही सही मगर उनके वे शब्द मेरे अंतस में कहीं बहुत गहरे घर कर गए थे और हो न हो आने वाले वक़्त में मैं शायद कभी मैं उनके वचन को साकार करने में सफल हो पाऊंगा| हाँ, वही हरे-भरे पहाड़ों के बीच, चीड़ के ऊंचे पेड़ों से घिरा, बादलों की छाँव में, जहाँ से हिमालय की गगनचुम्बी चोटियाँ मुझे प्रतिक्षण निहारती हों, एक छोटा सा मगर सुन्दर घर जिसके निर्माण में मित्रता की ईंटें, अपनत्व का गारा, स्नेह की छाजन का प्रयोग हो और यह सब आत्मीय संबंधों की सुदृढ़ नींव पर खड़े हों

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5

आदरणीय शाही जी, यहाँ पर टालमटोल वाला कोई प्रश्न ही नहीं है। आमोद-प्रमोद और विनोद से ही तो जीवन का रथ सुचारू रूप से चलायमान है अभी तक अन्यथा विकट समस्याओं और अनवरत दुश्वारियों के बीच तो सांस लेना भी दूभर है। रही बात संस्मरण की तो उसे काट-छांट कर, संपादन व संशोधन कर के दो कड़ियों के बीच सीमित किया है। आप जितना धैर्य मेरे अंदर नहीं जो रोहिणी की तेरह क़िश्तें प्रस्तुत कर पाऊं। दोनों भागों का संयोजन पहले ही कर चुका हूँ अतः अब उसमें परिवर्तन इत्यादि करना मुझे नए सिरे से परिश्रम करने हेतु बाध्य कर देगा। अगली एवं अंतिम कड़ी इस भाग की तुलना में थोड़ी लंबी है। आपके शक़्क़ी दिमाग के सरपट दौड़ते वैचारिक घोड़ों की रास अपने हाथों में रखें। थोड़ी सी प्रतीक्षा आपकी समीक्षा और गुप्तचरी को और भी गहराई दे सकेगी। काले चश्मे के पीछे की आँखों की जगह उसे संचालित करने वाले मन की आँखों की टोह लेने का प्रयास करें तो आपका ऐय्यारी का ये प्रयास सफल सिद्ध होगा।लॉयन और रॉबर्ट के साथ साथ मोना और मायकल भी थे ये भी बता देता हूँ ;) । पुलाव की ज़र्द खुश्बू में भी आप खिचड़ी की सोंधी महक खोज रहे हैं कहीं ऐसा न हो कि निराशा हाथ लगे। अगली कड़ी प्रकाशित होने के पश्चात आपकी कमेन्ट देखना चाहूँगा।  साभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

टालमटोल वाला विराम न दें, मज़ा किरकिरा हो जाएगा । बाक़ी सभी बातें विनोद के लिये हैं, विस्तारपूर्वक तीन चार कड़ियों में समापन कीजिये, लोग बंधे रहेंगे, और संस्मरण खुद एक यादगार बन जाएगा । जासूसी वाली बात उपन्यासों पर आधारित नहीं है । याद कीजिये, किसी ज़माने में जगप्रसिद्ध पर्वतारोही एडमन्ड हिलेरी ने 'सागर से आकाश तक' (From Ocean to Sky) नाम के अपने अभियान के तहत गंगासागर से गंगोत्री तक की यात्रा की थी । वही यात्रा, जिसमें इलाहाबाद संगम के तट पर उनके मोटर लांच के लंगर की डोर तट पर ध्यानस्थ एक योगी से छू भर गई थी, और इंजिन की सारी ताक़त लगा देने के बाद भी जब तक योगी ने आंखें नहीं खोलीं, उनकी मोटर नौका टस से मस नहीं हो पाई थी । भारतीय योग-तपस्या का लोहा विदेशी पर्वतारोही को मानना पड़ा । उनका अभियान सफ़ल रहा था, और मुझे याद है कि इस यात्रा-क्रम में उन्होंने भी अपनी एक रात ॠषिकेश के एक गेस्टहाउस में ही ग़ुज़ारी थी । उनके सफ़ल अभियान के वर्षों बाद हिमालय की नन्दादेवी पर्वतमालाओं में बर्फ़ के नीचे दबे प्लूटोनियम संयन्त्रों के कचरे की बरामदगी ने भारत सहित पूरी दुनिया में जैसे भूचाल ला दिया था, और नाभिकीय खतरे की सनसनी के बीच इस प्लान्टेशन के संदेह की सुई एडमन्ड हिलेरी के अभियान की ओर भी मुड़ी थी, और काफ़ी दिनों तक उनकी साहसिक यात्रा किसी विदेशी जासूसी कृत्य के रूप में चर्चित रही । आपके यात्रा संस्मरण में ॠषिकेश गेस्टहाउस के दबे से ज़िक्र ने मेरे कान खड़े कर दिये, और शक्की मन के भीतर पिछली होली के पूर्व हिमालय की गोद में घटित यारों की जमघट और उसके निहितार्थ की याद के साथ ही उथल-पुथल मच गई । तभी से टोह लेने में व्यस्त हूं । काले चश्मे के पीछे राजेंद्र जी के वास्तविक मनोभाव समझ पाना आसान नहीं होता । यानि कि वहां लायन भी मौज़ूद था, और राबर्ट भी । खिचड़ी पकना लाज़मी है । शेष अभी नो कमेंट !

के द्वारा:

प्रिय वाहिद भाई ....आदाब ! पिछले कई दिनों से नेट की स्लो स्पीड की समस्या से जूझना पड़ रहा था ..... खुद को अपडेट करने के चक्कर में आज सुबह जल्दी काम पर आकर कम्प्युटर पर बैठ गया की शायद शाम का कुछ समय की बचत हो जाए ..... लेकिन जब आपके ब्लॉग पर पहुंचा तो आफिस में दूसरे लोग आते दिखाई दिए ....इतना समय भी नहीं मिला की हिंदी की आप्शन लेकर कुछ लिख सकूं ....इसलिए जल्दी से दो शब्द लिख कर बाद में मिलने का वायदा कर लिया ..... अब जो इस रचना को पढ़ा तो जान की यह उपर से देखने में चाहे ज्यादा बड़ी होने का भ्रम देती थी , लेकिन पढ़ने पर असल में आकार में बेहद छोटी महसूस हुई .....क्यों ?.... यह आप जानते ही है -बताने की जरूरत ही नहीं है ..... इसके अगले भाग का इन्तजार रहेगा ..... धन्यवाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma Rajkamal Sharma

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

गुरुवर, आप गुरु हैं तो हम भी उसी रास्ते के राही हैं। कुछ पीछे ही सही मगर कभी कभी अगुआ की नज़रों से भी बहुत कुछ ऐसा छूट जाता है जो पश्चगामी देख लेते हैं। वो कहते हैं न कि कभी कभी आँखों में कुछ पड़ जाये तो सारी दुनिया ही दाग़दार दिखाई देने लगती है। तो वो तिनका मेरी नन्हीं सी त्रिकोणात्मक फसल में नहीं आपके लोचन में है। इस यात्रा का प्रारंभ मैंने देहरादून से इसलिए किया है क्यूंकि उसके पूर्व की घटनाओं में उतना रोमांच भी नहीं था और यह वृत्तान्त अनावश्यक रूप से लंबा हो जाता। हमारी कुण्डलियाँ तो आपने अपनी हार्डडिस्क में सेक्योर कर रखी हैं पर हमारे संचार उपग्रह भी कम नहीं हैं। अब तो उस दिन का इंतज़ार है जब हम चारों रूबरू होंगे वो भी एक साथ। पर कहना होगा कि आज आपका तीर सही निशाने पर नहीं था। किसी प्रकार की धृष्टता हो गयी तो अग्रिम क्षमायाचना की अर्ज़ी आपके दरबार में प्रेषित कर दी है| सनमन,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी

गुरुवर को सादर प्रणाम, आप भी कभी कभी ग़ज़ब कर देते हैं| ज़मीं की ख़ाक को फ़लक के सितारे से रिलेट कर दिया! आपके सद्भावना के लिए कृतज्ञ रहूँगा। वैसे एक बात ज़रूर कहना चाहूँगा की  न तो उस अतिथि गृह में कोई काला अध्याय सृजित हुआ था और न ही उसे छुपाने के लिए मुझे कोई कुटिल निर्देश मिला था। इस यात्रा में जितने भी अध्याय हैं (चाहे दिन के हों या रात के) वो सभी रंगीन ही हैं। और अगर मुझे उस दिन देहरादून के लिए रुख़सत नहीं किया गया होता तो आज ये संस्मरण भी आप सब के समक्ष नहीं होता। इस सफ़र से मुझे अफ़सोस के नाम पर कुछ भी नहीं मिला। होली का इंतज़ार तो हम भी कर रहे हैं... ;-) अगली कड़ी शीघ्र ही आप सब के अवलोकनार्थ प्रस्तुत करूँगा। आपका आशीर्वाद ऐसे ही मिलता रहे बस यही कामना करता हूँ। सादर एवं साभार,

के द्वारा: वाहिद काशीवासी वाहिद काशीवासी